Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
तत्सम्यक्त्वं सरागसम्यक्त्वाख्यं व्यवहारसम्यक्त्वमेवेति भावार्थः ।।१७।।
अथानन्तरं सूत्रचतुष्टयेन जीवादिषड्द्रव्याणां क्रमेण प्रत्येकं लक्षणं कथ्यते —
१४४) मुत्ति – विहूणउ णाणमउ परमाणंद – सहाउ ।
णियमिं जोइय अप्पु मुणि णिच्चु णिरंजणु भाउ ।।१८।।
मूर्तिविहीनः ज्ञानमयः परमानन्दस्वभावः ।
नियमेन योगिन् आत्मानं मन्यस्व नित्यं निरञ्जनं भावम् ।।१८।।
मुत्तिविहूणउ इत्यादि । मुत्ति-विहूणउ अमूर्तः शुद्धात्मनो विलक्षणया स्पर्श-
रसगन्धवर्णवत्या मूर्त्या विहीनत्वात् मूर्तिविहीनः । णाणमउ क्रमकरणव्यवधानरहितेन
लोकालोकप्रकाशकेन केवलज्ञानेन निर्वृत्तत्वात् ज्ञानमयः । परमाणंद – सहाउ वीतराग-
है । अब वास्तवमें (असलमें) विचारा जावे, तो गृहस्थ अवस्थामें इनके सरागसम्यक्त्व ही है
और जो सरागसम्यक्त्व है, वह व्यवहार ही है, ऐसा जानो ।।१७।।
आगे चार दोहोंसे छह द्रव्योंके क्रमसे हरएकके लक्षण कहते हैं —
गाथा – १८
अन्वयार्थ : — [योगिन् ] हे योगी, [नियमेन ] निश्चय करके [आत्मानं ] तू आत्माको
ऐसा [मन्यस्व ] जान । कैसा है आत्मा ? [मूर्तिविहीनः ] मूर्तिसे रहित है, [ज्ञानमयः ] ज्ञानमयी
है, [परमानंदस्वभावः ] परमानंद स्वभाववाला है, [नित्यं ] नित्य है, [निरंजनं ] निरंजन है,
[भावम् ] ऐसा जीवपदार्थ है ।
भावार्थ : — यह आत्मा अमूर्तीक शुद्धात्मासे भिन्न जो स्पर्श-रस-गंध-वर्णवाली मूर्ति
उससे रहित है, लोक-अलोकका प्रकाश करनेवाले केवलज्ञानकर पूर्ण है, जोकि केवलज्ञान
सब पदार्थोंको एक समयमें प्रत्यक्ष जानता है, आगे-पीछे नहीं जानता, वीतरागभाव परमानंदरूप
ତେ ଵୀତରାଗଚାରିତ୍ରନୀ ସାଥେ ଅଵିନାଭୂତ ନିଶ୍ଚଯସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵନୁଂ ପରଂପରାଏ ସାଧକ ଛେ. ଵସ୍ତୁତାଏ
(ଵାସ୍ତଵିକପଣେ) ତୋ ସରାଗସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵଥୀ କହେଵାମାଂ ଆଵତୁଂ ତେ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ଵ୍ଯଵହାରସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ଜ ଛେ, ଏଵୋ
ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୧୭.
ତ୍ଯାର ପଛୀ ଚାର ଦୋହକସୂତ୍ରୋଥୀ ଜୀଵାଦି ଛ ଦ୍ରଵ୍ଯୋମାଂନା ଦରେକନା କ୍ରମଥୀ ଲକ୍ଷଣ କହେ ଛେ : —
ଭାଵାର୍ଥ: — ହେ ଯୋଗୀ! ତୁଂ ଶୁଦ୍ଧନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ଆତ୍ମାନେ ଆଵୋ ଜାଣ କେ ତେ ଅମୂର୍ତ ଶୁଦ୍ଧ
ଆତ୍ମାଥୀ ଵିଲକ୍ଷଣ ସ୍ପର୍ଶ-ରସ-ଗଂଧ-ଵର୍ଣଵାଳୀ ମୂର୍ତିଥୀ ରହିତ ହୋଵାଥୀ ମୂର୍ତି ରହିତ ଛେ କ୍ରମ, କରଣ
ଦୋହ-୧୮ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୩୩