Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
तेषां वीतरागचारित्रमस्तीति परस्परविरोधः, अस्ति चेत्तर्हि तेषामसंयतत्वं कथमिति पूर्वपक्षः
तत्र परिहारमाह तेषां शुद्धात्मोपादेयभावनारूपं निश्चयसम्यक्त्वं विद्यते परं किंतु
चारित्रमोहोदयेन स्थिरता नास्ति व्रतप्रतिज्ञाभङ्गो भवतीति तेन कारणेनासंयता वा भण्यन्ते
शुद्धात्मभावनाच्युताः सन्तः भरतादयो निर्दोषिपरमात्मनामर्हत्सिद्धानां गुणस्तववस्तुस्तवरूपं
स्तवनादिकं कुर्वन्ति तच्चरितपुराणादिकं च समाकर्णयन्ति तदाराधकपुरुषाणामाचार्योपाध्याय-
साधूनां विषयकषायदुर्ध्यानवञ्चनार्थं संसारस्थितिच्छेदनार्थं च दानपूजादिकं कुर्वन्ति तेन कारणेन
शुभरागयोगात् सरागसम्यग्दृष्टयो भवन्ति
या पुनस्तेषां सम्यक्त्वस्य निश्चयसम्यक्त्वसंज्ञा
वीतरागचारित्राविनाभूतस्य निश्चयसम्यक्त्वस्य परंपरया साधकत्वादिति वस्तुवृत्त्या तु
यही परस्पर विरोध है यदि उनके वीतरागचारित्र माना जावे, तो गृहस्थपना क्यों कहा ? यह
प्रश्न किया उसका उत्तर श्रीगुरु देते हैं उन महान् (बड़े) पुरुषोंके शुद्धात्मा उपादेय है ऐसी
भावनारूप निश्चयसम्यक्त्व तो है, परन्तु चारित्रमोहके उदयसे स्थिरता नहीं है जब तक
महाव्रतका उदय नहीं है, तब तक असंयमी कहलाते हैं, शुद्धात्माकी अखंड भावनासे रहित
हुए भरत, सगर, राघव, पांडवादिक निर्दोष परमात्मा अरहंत सिद्धोंके गुणस्तवन वस्तुस्तवनरूप
स्तोत्रादि करते हैं, और उनके चारित्र पुराणादिक सुनते हैं, तथा उनकी आज्ञाके आराधक जो
महान पुरुष, आचार्य, उपाध्याय, साधु उनको भक्तिसे आहारदानादि करते हैं, पूजा करते हैं
विषय कषायरूप खोटे ध्यानके रोकनेके लिये तथा संसारकी स्थितिके नाश करनेके लिये ऐसी
शुभ क्रिया करते हैं
इसलिये शुभ रागके संबंधसे सम्यग्दृष्टि हैं, और इनके निश्चयसम्यक्त्व
भी कहा जा सकता है, क्योंकि वीतरागचारित्रसे तन्मयी निश्चयसम्यक्त्वके परम्पराय साधकपना
ହୋତୁଂ ନଥୀ, ତୋ ଏ ପ୍ରମାଣେ ପରସ୍ପର ଵିରୋଧ ଆଵେ ଛେ. ଜୋ ଆପ କହୋ କେ ତେମନେ ଵୀତରାଗ ଚାରିତ୍ର
ହୋଯ ଛେ ତୋ ତେମନେ ଅସଂଯତପଣୁଂ କହ୍ଯୁଂ ଛେ ତେ କେଵୀ ରୀତେ ଘଟୀ ଶକେ?
ତେନୋ ପରିହାର କହେ ଛେତେ ମହାପୁରୁଷୋନେ ‘ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମା ଉପାଦେଯ ଛେ’ ଏଵୀ ଭାଵନାରୂପ
ନିଶ୍ଚଯସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ହୋଯ ଛେ, ପଣ ଚାରିତ୍ରମୋହନା ଉଦଯଥୀ ସ୍ଥିରତା ହୋତୀ ନଥୀ, ଵ୍ରତପ୍ରତିଜ୍ଞାନୋ ଭଂଗ ଥାଯ
ଛେ, ତେ କାରଣେ ତେମନେ ଅସଂଯତ କହ୍ଯା ଛେ.
ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାନୀ ଭାଵନାଥୀ ଚ୍ଯୁତ ଥତାଂ (ଜ୍ଯାରେ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାନୀ ଭାଵନା ରହେତୀ ନଥୀ ତ୍ଯାରେ)
ଭରତାଦି ଅର୍ହଂତ ସିଦ୍ଧ ଏଵା ନିର୍ଦୋଷ ପରମାତ୍ମାନା ଗୁଣସ୍ତଵନ, ଵସ୍ତୁସ୍ତଵନରୂପ ସ୍ତଵନାଦି କରେ ଛେ ଅନେ
ତେମନାଂ ଚରିତ୍ର ତଥା ପୁରାଣାଦିକ ସାଂଭଳେ ଛେ. ତେମନା ଆରାଧକ ପୁରୁଷୋ ଏଵା ଆଚାର୍ଯ, ଉପାଧ୍ଯାଯ ଅନେ
ସାଧୁଓନେ ଵିଷଯକଷାଯନା ଦୁର୍ଧ୍ଯାନନୀ ଵଂଚନା ଅର୍ଥେ, ସଂସାରସ୍ଥିତିନା ଛେଦନ ଅର୍ଥେ ଦାନପୂଜାଦିକ କରେ ଛେ
ତେ କାରଣେ ଶୁଭରାଗନା ସଂବଂଧଥୀ ତେଓ ସରାଗସମ୍ଯଗ୍ଦ୍ରଷ୍ଟି ଛେ.
ଵଳୀ, ତେମନା (ସରାଗ) ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵନେ ନିଶ୍ଚଯସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵନୁଂ ନାମ ପଣ ଘଟୀ ଶକେ ଛେ, କାରଣ କେ
୨୩୨ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୭