Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 231 of 565
PDF/HTML Page 245 of 579

background image
Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
पोग्गलु धम्माहम्मु णहु पुद्गलधर्माधर्मनभांसि कथंभूतानि तानि कालें सहिया कालद्रव्येण
सहितानि
पुनरपि कथंभूतानि भिण्ण स्वकीयस्वकीयलक्षणेन परस्परं भिन्नानि इति तथाहि
द्विधा सम्यक्त्वं भण्यते सरागवीतरागभेदेन सरागसम्यक्त्वलक्षणं कथ्यते प्रशम-
संवेगानुकम्पास्तिक्याभिव्यक्ति लक्षणं सरागसम्यक्त्वं भण्यते, तदेव व्यवहारसम्यक्त्वमिति तस्य
विषयभूतानि षड्द्रव्याणीति
वीतरागसम्यक्त्वं निजशुद्धात्मानुभूतिलक्षणं वीतरागचारित्राविनाभूतं
तदेव निश्चयसम्यक्त्वमिति अत्राह प्रभाकरभट्टः निजशुद्धात्मैवोपादेय इति रुचिरूपं
निश्चयसम्यक्त्वं भवतीति बहुधा व्याख्यातं पूर्वं भवद्भिः, इदानीं पुनः वीतरागचारित्राविनाभूतं
निश्चयसम्यक्त्वं व्याख्यातमिति पूर्वापरविरोधः कस्मादिति चेत्
निजशुद्धात्मैवोपादेय इति
रुचिरूपं निश्चयसम्यक्त्वं गृहस्थावस्थायां तिर्थंकरपरमदेवभरतसगररामपाण्डवादीनां विद्यते, न च
जगतसे अरुचि, अनुकंपा परजीवोंको दुःखी देखकर दया भाव और आस्तिक्य अर्थात् देव-गुरु-
धर्मकी तथा छह द्रव्योंकी श्रद्धा इन चारोंका होना वह व्यवहारसम्यक्त्वरूप सरागसम्यक्त्व है,
और वीतरागसम्यक्त्व जो निश्चयसम्यक्त्व वह निजशुद्धात्मानुभूतिरूप वीतरागचारित्रसे तन्मयी
है
यह कथन सुनकर प्रभाकरभट्टने प्रश्न किया हे प्रभो, निज शुद्धात्मा ही उपादेय है, ऐसी
रुचिरूप निश्चयसम्यक्त्वका कथन पहले तुमने अनेक बार किया, फि र अब वीतरागचारित्रसे
तन्मयी निश्चयसम्यक्त्व है, वह व्याख्यान करते हैं, सो यह तो पूर्वापर विरोध है
क्योंकि जो
निज शुद्धात्मा ही उपादेय हैं, ऐसी रुचिरूप निश्चयसम्यक्त्व तो गृहस्थमें तीर्थंकर परमदेव भरत
चक्रवर्ती और राम, पांडवादि बड़े
बड़े पुरुषोंके रहता है, लेकिन उनके वीतरागचारित्र नहीं है
ଆକାଶ, କାଳସହିତ ପାଂଚଦ୍ରଵ୍ଯୋ ଅଚେତନ ଛେ; ଏମ ତୁଂ ଜାଣ.
ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ବେ ପ୍ରକାରନୁଂ ଛେ, ଏକ ସରାଗ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ, ବୀଜୁଂ ଵୀତରାଗ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ.
ସରାଗ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵନୁଂ ସ୍ଵରୂପ କହେଵାମାଂ ଆଵେ ଛେ. ପ୍ରଶମ, ସଂଵେଗ, ଅନୁକଂପା ଅନେ ଆସ୍ତିକ୍ଯନୀ
ଅଭିଵ୍ଯକ୍ତି ଲକ୍ଷଣଵାଳୁଂ ସରାଗ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ଛେ, ତେ ଜ ଵ୍ଯଵହାର ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ଛେ. ତେନାଂ ଵିଷଯଭୂତ ଛ
ଦ୍ରଵ୍ଯୋ ଛେ. ଵୀତରାଗ ଚାରିତ୍ରନୀ ସାଥେ ଅଵିନାଭାଵୀ, ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାନୀ ଅନୁଭୂତିସ୍ଵରୂପ ଵୀତରାଗ-
ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ଛେ ତେ ଜ ନିଶ୍ଚଯସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ଛେ.
ଆ କଥନ ସାଂଭଳୀନେ ଅହୀଂ ପ୍ରଭାକରଭଟ୍ଟ ପୂଛେ ଛେ କେ ହେ ପ୍ରଭୁ! ‘ଏକ ନିଜଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମା ଜ
ଉପାଦେଯ ଛେ’ ଏଵୀ ରୁଚିରୂପ ନିଶ୍ଚଯସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ଛେ ଏମ ଆପେ ପୂର୍ଵେ ଅନେକଵାର କହ୍ଯୁଂ ଛେ ଅନେ ଅହୀଂ
ଆପ ଵୀତରାଗଚାରିତ୍ରନୀ ସାଥେ ଅଵିନାଭୂତ ନିଶ୍ଚଯସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ହୋଯ ଛେ ଏମ ଆପେ କହ୍ଯୁଂ, ତୋ ତେମାଂ
ପୂର୍ଵାପର ଵିରୋଧ ଆଵେ ଛେ. ତୋ କେଵୀ ରୀତେ ଵିରୋଧ ଆଵେ ଛେ ଏମ କହୋ, ତୋ ତେନୁଂ କାରଣ ଆ ଛେ କେ
ନିଜଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମା ଜ ଉପାଦେଯ ଛେ ଏଵୀ ରୁଚିରୂପ ନିଶ୍ଚଯସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ଗୃହସ୍ଥାଵସ୍ଥାମାଂ ତୀର୍ଥଂକର ପରମଦେଵ,
ଭରତଚକ୍ରଵର୍ତୀ, ସଗରଚକ୍ରଵର୍ତୀ, ରାମ, ପାଂଡଵ ଆଦି ମହାପୁରୁଷୋନେ ହୋଯ ଛେ ପଣ ତେମନେ ଵୀତରାଗଚାରିତ୍ର
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୭ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୩୧