Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
यद्यपि वज्रवृषभनाराचसंहननरूपेण पुद्गलद्रव्यं मुक्ति गमनकाले सहकारिकारणं भवति तथापि
धर्मद्रव्यं च गतिसहकारिकारणं भवति, अधर्मद्रव्यं च लोकाग्रे स्थितस्य स्थितिसहकारिकारणं
भवति । यद्यपि मुक्त ात्मप्रदेशमध्ये परस्परैकक्षेत्रावगाहेन तिष्ठन्ति तथापि निश्चयेन विशुद्धज्ञान-
दर्शनस्वभावपरमात्मानः सकाशाद्भिन्नस्वरूपेण मुक्त ौ तिष्ठन्ति । तथात्र संसारे चेतनाकारणानि
हेयानीति भावार्थः ।।१९।।
अथ —
१४६) दव्वुइँ सयलइँ उवरि ठियइँ णियमेँ जासु वसंति ।
तं णहु दव्वु वियाणि तुहुं जिणवर एउ भणंति ।।२०।।
ऐसा वीतरागदेवने कहा है । यहाँ पर एक बात देखनेकी है कि यद्यपि वज्रवृषभनाराचसंहनन-
रूप पुद्गलद्रव्य मोक्षके गमनका सहायक है, इसके बिना मुक्ति नहीं हो सकती, तो भी
धर्मद्रव्य गति सहायी है, इसके बिना सिद्धलोकको जाना नहीं हो सकता, तथा अधर्मद्रव्य
सिद्धलोकमें स्थितिका सहायी है । लोक – शिखर पर आकाशके प्रदेश अवकाशमें सहायी हैं ।
अनंते सिद्ध अपने स्वभावमें ही ठहरे हुए हैं, परद्रव्यका कुछ प्रयोजन नहीं है । यद्यपि
मुक्तात्माओंके प्रदेश आपसमें एक जगह हैं, तो भी विशुद्ध, ज्ञान, दर्शन, भाव, भगवान्
सिद्धक्षेत्रमें भिन्न – भिन्न स्थित हैं, कोई सिद्ध किसी सिद्धिसे प्रदेशोंकर मिला हुआ नहीं है ।
पुद्गलादि पाँचों द्रव्य जीवको यद्यपि निमित्त कारण कहे गये हैं, तो भी उपादानकारण नहीं
है, ऐसा सारांश हुआ ।।१९।।
ଅହୀଂ, ଜୋଵାନୁଂ ଏ (ଵାତ ଦେଖଵାନୀ)ଛେ କେ ଵଜ୍ରଵୃଷଭନାରାଚସଂହନନରୂପେ ପୁଦ୍ଗଲଦ୍ରଵ୍ଯ
ମୁକ୍ତି-ଗମନକାଳେ ସହକାରୀ କାରଣ ଛେ, ତେମଜ ଧର୍ମଦ୍ରଵ୍ଯ ପଣ ଗତିମାଂ ସହକାରୀ କାରଣ ଛେ, ଅଧର୍ମଦ୍ରଵ୍ଯ
ପଣ ଲୋକାଗ୍ରେ ସ୍ଥିତ ଥତା ସିଦ୍ଧନେ ସ୍ଥିତିମାଂ ସହକାରୀ କାରଣ ଛେ.
ଜୋକେ ଆ ବଧା ଦ୍ରଵ୍ଯୋ ମୁକ୍ତାତ୍ମାନା ପ୍ରଦେଶମାଂ ଏକକ୍ଷେତ୍ରାଵଗାହେ ରହେ ଛେ ତୋପଣ ନିଶ୍ଚଯଥୀ ଵିଶୁଦ୍ଧ
ଜ୍ଞାନ, ଵିଶୁଦ୍ଧ ଦର୍ଶନ ଜେନୋ ସ୍ଵଭାଵ ଛେ ଏଵା ପରମାତ୍ମାଥୀ ତେଓ ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ସ୍ଵରୂପେ ମୁକ୍ତିମାଂ
ରହେ ଛେ;
ତଥା ଆ ସଂସାରମାଂ ଚେତନନାଂ କାରଣୋ (ନିମିତ୍ତ କାରଣୋ) ହୋଯ ଛେ, ଏଵୋ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ପଣ
(ଉପାଦାନ କାରଣଥୀ) ହେଯ ଛେ. ୧୯.
୨୩୬ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୦