Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-21 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
द्रव्याणि सकलानि उदरे स्थितानि नियमेन यस्य वसन्ति
तत् नभः द्रव्यं विजानीहि त्वं जिनवरा एतद् भणन्ति ।।२०।।
दव्वइं द्रव्याणि कतिसंख्योपेतानि सयलइं समस्तानि उवरि उदरे ठियइं स्थितानि णियमें
निश्चयेन जासु यस्य वसन्ति आधाराधेयभावेन तिष्ठन्ति तं तत् णहु दव्वु नभ आकाशद्रव्यं वियाणि
विजानीहि तुहुं त्वं हे प्रभाकरभट्ट
जिणवर जिनवराः वीतरागसर्वज्ञाः एउ भणंति एतद्भणन्ति
कथयन्तीति
अयमत्र तात्पर्यार्थः यद्यपि परस्परैकक्षेत्रावगाहेन तिष्ठत्याकाशं तथापि साक्षादुपादेय-
भूतादनन्तसुखस्वरूपात्परमात्मनः सकाशादत्यन्तभिन्नत्वाद्धेयमिति ।।२०।।
अथ
१४७) कालु मुणिज्जहि दव्वु तुहुँ वट्टणलक्खणु एउ
रयणहँ रासि विभिण्ण जिम तसु अणुयहँ तह भेउ ।।२१।।
आगे आकाशका स्वरूप कहते हैं
गाथा२०
अन्वयार्थ :[यस्य ] जिसके [उदरे ] अंदर [सकलानि द्रव्याणि ] सब द्रव्यें
[स्थितानि ] स्थित हुई [नियमेन वसंति ] निश्चयसे आधार आधेयरूप होकर रहती हैं, [तत् ]
उसको [त्वं ] तू [नभः द्रव्यं ] आकाशद्रव्य [विजानीहि ] जान, [एतत् ] ऐसा [जिनवराः ]
जिनेन्द्रदेव [भणंति ] कहते हैं
लोकाकाश आधार है, अन्य सब द्रव्य आधेय है
भावार्थ :यद्यपि ये सब द्रव्य आकाशमें परस्पर एक क्षेत्रावगाहसे ठहरी हुई हैं, तो
भी आत्मासे अत्यंत भिन्न हैं, इसलिये त्यागने योग्य हैं, और आत्मा साक्षात् आराधने योग्य हैं,
अनंतसुखस्वरूप है
।।२०।।
आगे कालद्रव्यका व्याख्यान करते हैं
ହଵେ, ଆକାଶନୁଂ ସ୍ଵରୂପ କହେ ଛେ :
ଭାଵାର୍ଥ:ଜୋକେ ସର୍ଵ ଦ୍ରଵ୍ଯୋ ପରସ୍ପର ଏକକ୍ଷେତ୍ରାଵଗାହଥୀ ଆକାଶମାଂ ରହେ ଛେ ତୋପଣ ତେ
(ଆକାଶ) ସାକ୍ଷାତ୍ ଉପାଦେଯଭୂତ ଅନଂତଚତୁଷ୍ଟଯ ସ୍ଵରୂପ ପରମାତ୍ମାଥୀ ଅତ୍ଯଂତ ଭିନ୍ନ ହୋଵାଥୀ ହେଯ
ଛେ. ୨୦.
ହଵେ, କାଳଦ୍ରଵ୍ଯନୁଂ ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନ କରେ ଛେ :
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୧ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୩୭