Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
स्कन्धानां धर्मद्रव्ये विद्यमानेऽपि जलवत् द्रव्यकालो गतेः सहकारिकारणं भवतीत्यर्थः अत्र
निश्चयनयेन निःक्रियसिद्धस्वरूपसमानं निजशुद्धात्मद्रव्यमुपादेयमिति तात्पर्यम् तथा चोक्तं
निश्चयनयेन निःक्रियजीवलक्षणम्‘‘यावत्क्रियाः प्रवर्तन्ते तावद् द्वैतस्य गोचराः अद्वये
निष्कले प्राप्ते निःक्रियस्य कुतः क्रिया ।।’’ ।।२३।।
क्रियावंत हैं, और शेष चार द्रव्य अक्रियावाले हैं, चलनहलन क्रियासे रहित हैं जीवको दूसरी
गतिमें गमनका कारण कर्म है, वह पुद्गल है और पुद्गलको गमनका कारण काल है जैसे
धर्मद्रव्यके मौजूद होने पर भी मच्छोंको गमनसहायी जल है, उसी तरह पुद्गलको धर्मद्रव्यके
होने पर भी द्रव्यकाल गमनका सहकारी कारण है
यहाँ निश्चयनयकर गमनादि क्रियासे रहित
निःक्रिय सिद्धस्वरूपके समान निःक्रिय निर्द्वंद्व निज शुद्धात्मा ही उपादेय है, यह शास्त्रका तात्पर्य
हुआ
इसी प्रकार दूसरे ग्रन्थोंमें भी निश्चयकर हलन-चलनादि क्रिया रहित जीवका लक्षण
कहा है ‘‘यावत्क्रिया’’ इत्यादि इसका अर्थ ऐसा है कि जब-तक इस जीवके हलन-
चलनादि क्रिया है, गतिसे गत्यंतरको जाना है, तब तक दूसरे द्रव्यका सम्बन्ध है, जब दूसरेका
सम्बन्ध मिटा, अद्वैत हुआ, तब निकल अर्थात् शरीरसे रहित निःक्रिय है, उसके हलन-चलनादि
क्रिया कहाँसे हो सकती हैं; अर्थात् संसारी जीवके कर्मके सम्बन्धसे गमन है, सिद्धभगवान्
कर्मरहित निःक्रिय हैं, उनके गमनागमन क्रिया कभी नहीं हो सकती
।।२३।।
ଅର୍ଥ:ବାହ୍ଯ କାରଣ ସହିତ ରହେଲା ଜୀଵୋ ଅନେ ପୁଦ୍ଗଲୋ ସକ୍ରିଯ ଛେ, ବାକୀନାଂ ଦ୍ରଵ୍ଯୋ ସକ୍ରିଯ
ନଥୀ (ନିଷ୍କ୍ରିଯ ଛେ). ଜୀଵୋ ପୁଦ୍ଗଲକରଣଵାଳା (ଜେମନେ ସକ୍ରିଯପଣାମାଂ ପୁଦ୍ଗଲ ବହିରଂଗ ସାଧନ ହୋଯ
ଏଵା) ଛେ ଅନେ ସ୍କଂଧୋ ଅର୍ଥାତ୍ ପୁଦ୍ଗଲୋ ତୋ କାଳକରଣଵାଳା (ଜେମନେ ସକ୍ରିଯପଣାମାଂ କାଳ ବହିରଂଗ
ସାଧନ ହୋଯ ଏଵା) ଛେ.
ଜେଵୀ ରୀତେ ମାଛଲାଂନେ ଧର୍ମଦ୍ରଵ୍ଯ ଵିଦ୍ଯମାନ ହୋଵା ଛତାଂ ପଣ ଜଳ ଗତିନୁଂ ସହକାରୀ କାରଣ ଛେ
ତେଵୀ ରୀତେ ପୁଦ୍ଗଲସ୍କଂଧୋନେ ଧର୍ମଦ୍ରଵ୍ଯ ଵିଦ୍ଯମାନ ହୋଵା ଛତାଂ ପଣ, ଦ୍ରଵ୍ଯକାଳ ଗତିନୁଂ ସହକାରୀ କାରଣ
ଛେ, ଏଵୋ
ଅର୍ଥ ଛେ.
ଅହୀଂ, ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ନିଷ୍କ୍ରିଯ ସିଦ୍ଧସ୍ଵରୂପ ସମାନ (ନିଷ୍କ୍ରିଯ) ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମଦ୍ରଵ୍ଯ ଉପାଦେଯ ଛେ,
ଏଵୁଂ ତାତ୍ପର୍ଯ ଛେ.
ବୀଜୀ ଜଗ୍ଯାଏ ପଣ ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ନିଷ୍କ୍ରିଯ ଜୀଵନୁଂ ଲକ୍ଷଣ କହ୍ଯୁଂ ଛେ କେ ‘‘यावत्क्रियाः प्रवर्तन्ते
तावद् द्वैतस्य गोचराः अद्वये निष्कले प्राप्ते निःक्रियस्य कुतः क्रिया ।।’’ଅର୍ଥ:ଜ୍ଯାଂ ସୁଧୀ ଆ ଜୀଵନେ
ହଲନଚଲନାଦି କ୍ରିଯା ଵର୍ତେ ଛେ ତ୍ଯାଂ ସୁଧୀ ଦ୍ଵୈତ ଜୋଵାମାଂ ଆଵେ ଛେ. ଅଦ୍ଵୈତ ଅନେ ନିଷ୍କଲ ଥତାଂ, ନିଷ୍କ୍ରିଯନେ
କ୍ରିଯା କେଵୀ ରୀତେ ହୋଯ? ୨୩.
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୩ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୪୫