Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
अथ पञ्चास्तिकायसूचनार्थं कालद्रव्यमप्रदेशं विहाय कस्य द्रव्यस्य कियन्तः प्रदेशा
भवन्तीति कथयति —
१५०) धम्माधम्मु वि एक्कु जिऊ ए जि असंख्य-पदेस ।
गयणु अणंत-पएसु मुणि बहु-विह पुग्गल-देस ।।२४।।
धर्माधर्मौ अपि एकः जीवः एतानि एव असंख्यप्रदेशानि ।
गगनं अनन्तप्रदेशं मन्यस्व बहुविधाः पुद्गलदेशाः ।।२४।।
धम्माधम्मु वि इत्यादि । धम्माधम्मु वि धर्माधर्मद्वितयमेव एक्कु जिउ एको विवक्षितो
जीवः । ए जि एतान्येव त्रीणि द्रव्याणि असंख्य-पदेश असंख्येयप्रदेशानि भवन्ति । गयणु गगनं
अणंत-पएसु अनन्तप्रदेशं मुणि मन्यस्व जानीहि । बहु-विह बहुविधा भवन्ति । के ते । पुग्गल-
देस पुद्गलप्रदेशाः । अत्र पुद्गलद्रव्यप्रदेशविवक्षया प्रदेशशब्देन परमाणवो ग्राह्याः न च क्षेत्रप्रदेशा
आगे पंचास्तिकायके प्रगट करनेके लिये कालद्रव्य अप्रदेशीको छोड़कर अन्य पाँच
द्रव्योंमेंसे किसके कितने प्रदेश हैं, यह कहते हैं —
गाथा – २४
अन्वयार्थ : — [धर्माधर्मौ ] धर्मद्रव्य-अधर्मद्रव्य [अपि एकः जीवः ] और एक जीव
[एतानि एव ] इन तीनों ही को [असंख्यप्रदेशानि ] असंख्यात प्रदेशी [मन्यस्व ] तू जान,
[गगनं ] आकाश [अनंतप्रदेशं ] अनंतप्रदेशी है, [पुद्गलप्रदेशाः ] और पुद्गलके प्रदेश
[बहुविधाः ] बहुत प्रकारके हैं, परमाणु तो एकप्रदेशी है, और स्कंध संख्यातप्रदेश,
असंख्यातप्रदेश तथा अनंतप्रदेशी भी होते हैं ।
भावार्थ : — जगत्में धर्मद्रव्य तो एक ही है, वह असंख्यातप्रदेशी है, अधर्मद्रव्य भी
एक है, असंख्यातप्रदेशी है, जीव अनंत हैं, सो एक एक जीव असंख्यात प्रदेशी हैं, आकाशद्रव्य
एक ही है, वह अनंतप्रदेशी है, ऐसा जानो । पुद्गल एक प्रदेशसे लेकर अनंतप्रदेश तक है ।
एक परमाणु तो एक प्रदेशी है, और जैसे जैसे परमाणु मिलते जाते हैं, वैसे वैसे प्रदेश भी
ହଵେ, ପଂଚାସ୍ତିକାଯନୀ ସୂଚନାର୍ଥେ ଅପ୍ରଦେଶୀ କାଳଦ୍ରଵ୍ଯ ସିଵାଯନା ଅନ୍ଯ ପାଂଚ ଦ୍ରଵ୍ଯୋମାଂ କ୍ଯା
ଦ୍ରଵ୍ଯନେ କେଟଲା ପ୍ରଦେଶୋ ହୋଯ ଛେ ତେ କହେ ଛେ : —
ଅହୀଂ, ପୁଦ୍ଗଲଦ୍ରଵ୍ଯପ୍ରଦେଶୋନୀ ଵିଵକ୍ଷାଥୀ (ପୁଦ୍ଗଲନା କଥନମାଂ) ‘ପ୍ରଦେଶ’ ଶବ୍ଦଥୀ ପରମାଣୁଓ
ସମଜଵା ପଣ କ୍ଷେତ୍ରନା ପ୍ରଦେଶୋ ନ ସମଜଵା, କାରଣ କେ ପୁଦ୍ଗଲୋନେ ଅନଂତ କ୍ଷେତ୍ରପ୍ରଦେଶୋନୋ ଅଭାଵ ଛେ.
୨୪୬ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୪