Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-25 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
गाथा२५
अन्वयार्थ :[जीव ] हे जीव, [अत्र जगति ] इस संसारमें [यानि द्रव्याणि
कथितानि ] जो द्रव्य कहे गये हैं, [तानि ] वे सब [लोकाकाशं धृत्वा ] लोकाकाशमें स्थित
हैं, लोकाकाश तो आधार है, और ये सब आधेय हैं, [एकत्वे मिलितानि ] ये द्रव्य एक क्षेत्र
में मिले हुए रहते हैं, एक क्षेत्रावगाही हैं, तो भी [स्वगुणेषु ] निश्चयनयकर अपने अपने गुणों
में ही [निवसंति ] निवास करते हैं, परद्रव्यसे मिलते नहीं हैं
भावार्थ :यद्यपि उपचरितअसद्भूतव्यवहारनयकर आधाराधेयभावसे एक
क्षेत्रावगाहकर तिष्ठ रहे हैं, तो भी शुद्ध पारिणामिक परमभाव ग्राहक शुद्ध द्रव्यार्थिकनयसे
परद्रव्यसे मिलनेरूप संकर
दोषसे रहित हैं, और अपने अपने सामान्य गुण तथा विशेष गुणोंको
(‘सगुणहिं’ ତ୍ରୀଜୀ ଵିଭକ୍ତିନା ଅଂତଵାଳୁଂ କରଣସୂଚକ ଆ ପଦ ‘ପୋତାନା ଗୁଣୋମାଂ’ ଏମ
ଅଧିକରଣନା (ସାତମୀ ଵିଭକ୍ତିନା) ଅର୍ଥଵାଳୁଂ କେଵୀ ରୀତେ ଥଯୁଂ? ପୂର୍ଵେ କହ୍ଯୁଂ ଜ ଛେ କେ ପ୍ରାକୃତ ଭାଷାମାଂ
କୋଈ ଵାର କାରକଵ୍ଯଭିଚାର ଅନେ ଲିଂଗଵ୍ଯଭିଚାର ଥାଯ ଛେ.)
ଭାଵାର୍ଥ:ଜୋକେ ପୂର୍ଵୋକ୍ତ ଛଏ ଦ୍ରଵ୍ଯୋ ଉପଚରିତ ଅସଦ୍ଭୂତ-ଵ୍ଯଵହାରନଯଥୀ ଆଧାର
-ଆଧେଯ ଭାଵଥୀ ଏକକ୍ଷେତ୍ରାଵଗାହେ ରହେ ଛେ ତୋପଣ ଶୁଦ୍ଧପାରିଣାମିକ ପରମ ଭାଵଗ୍ରାହକ
ଶୁଦ୍ଧଦ୍ରଵ୍ଯାର୍ଥିକନଯଥୀ ସଂକର ଵ୍ଯତିକର ଦୋଷୋନା ପରିହାର ଵଡେ ପୋତପୋତାନା ସାମାନ୍ଯ ଵିଶେଷ ଶୁଦ୍ଧ ଗୁଣୋନେ
ଛୋଡତାଂ ନଥୀ.
१५१) लोयागासु धरेवि जिय कहियइँ दव्वइँ जाइँ
एक्कहिँ मिलियइँ इत्थु जगि सगुणहिँ णिवसहिँ ताइँ ।।२५।।
लोकाकाशं धृत्वा जीव कथितानि द्रव्याणि यानि
एकत्वे मिलितानि अत्र जगति स्वगुणेषु निवसन्ति तानि ।।२५।।
लोयागासु इत्यादि लोयागासु लोकाकाशं कर्मतापन्नं धरेवि धृत्वा मर्यादीकृत्य जिय
हे जीव अथवा लोकाकाशमाधारीकृत्वा ठियाइं आधेयरूपेण स्थितानि कानि स्थितानि
कहियइं दव्वइं जाइं कथितानि जीवादिद्रव्याणि यानि पुनः कथंभूतानि एक्कहिं मिलियइं
एकत्वे मिलितानि इत्थु जगि अत्र जगति सगुणहिं णिवसहिं निश्चयनयेन स्वकीयगुणेषु
निवसन्ति ‘सगुणहिं’ तृतीयान्तं करणपदं स्वगुणेष्वधिकरणं कथं जातमिति ननु कथितं पूर्व
୧ ପାଠାନ୍ତର :कृत्य = कृत्वा
୨୪୮ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୫