Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
नहीं छोड़ते हैं । यह कथन सुनकर प्रभाकरभट्टने प्रश्न किया है कि हे भगवन्, परमागममें
लोकाकाश तो असंख्यातप्रदेशी कहा है, उस असंख्यात प्रदेशी लोकमें अनंत जीव किस तरह
समा सकते हैं ? क्योंकि एक एक जीवके असंख्यात-असंख्यात प्रदेश हैं, और एक एक
जीवमें अनंतानंत पुद्गलपरमाणु कर्म नोकर्मरूपसे लग रही है, और उसके सिवाय अनन्तगुणे
अन्य पुद्गल रहते हैं, सो ये द्रव्य असंख्यातप्रदेशी लोकमें कैसे समा गये ? इसका समाधान
श्री गुरु करते हैं । आकाशमें अवकाशदान (जगह देनेकी) शक्ति है, उसके सम्बन्धसे समा
जाते हैं । जैसे एक गूढ़ नागरस गुटिकामें शत, सहस्र, लक्ष, सुवर्ण संख्या आ जाती है, अथवा
एक दीपकके प्रकाशमें बहुत दीपकोंका प्रकाश जगह पाता है, अथवा जैसे एक राखके घड़ेमें
जलका घड़ा अच्छी तरह अवकाश पाता है, भस्ममें जल शोषित हो जाता है, अथवा जैसे
ଆ କଥନ ସାଂଭଳୀନେ ପ୍ରଭାକରଭଟ୍ଟ ପୂଛେ ଛେ କେ ହେ ଭଗଵାନ! ପରମାଗମମାଂ ଲୋକନେ ଅସଂଖ୍ଯାତ
ପ୍ରଦେଶୀ କହ୍ଯୋ ଛେ, ତେ ଅସଂଖ୍ଯାତ ପ୍ରଦେଶୀ ଲୋକମାଂ ପ୍ରତ୍ଯେକ ପ୍ରତ୍ଯେକ ଅସଂଖ୍ଯାତପ୍ରଦେଶୀ ଏଵା ଅନଂତ ଜୀଵଦ୍ରଵ୍ଯୋ
ଅନେ ତେ ଏକ ଏକ ଜୀଵଦ୍ରଵ୍ଯମାଂ କର୍ମ-ନୋକର୍ମରୂପେ ଅନଂତ ପୁଦ୍ଗଲପରମାଣୁଦ୍ରଵ୍ଯୋ ରହେ ଛେ. ତେ ଅନଂତ
ପୁଦ୍ଗଲପରମାଣୁଦ୍ରଵ୍ଯଥୀ ପଣ ଅନଂତଗୁଣା ବାକୀନା ପୁଦ୍ଗଲ ପରମାଣୁଦ୍ରଵ୍ଯୋ ରହେ ଛେ, ତୋ ତେ ସର୍ଵ ଦ୍ରଵ୍ଯୋ
ଅସଂଖ୍ଯପ୍ରଦେଶଵାଳା ଲୋକମାଂ କେଵୀ ରୀତେ ଅଵକାଶ ପାମେ (ରହୀ ଶକେ)? ଏଵୋ ପୂର୍ଵପକ୍ଷ ଛେ.
ଭଗଵାନ ଶ୍ରୀ ଗୁରୁ ତେନୋ ପରିହାର କରେ ଛେ, ଅଵଗାହନଶକ୍ତିନେ ଲୀଧେ (ଆକାଶମାଂ ଅଵକାଶ
ଦେଵାନୀ ଶକ୍ତି ଛେ ତେନା କାରଣେ ପୂର୍ଵୋକ୍ତ ଛ ଦ୍ରଵ୍ଯୋ ଏକକ୍ଷେତ୍ରାଵଗାହେ ରହେ ଛେ.) ତେ ଆ ପ୍ରମାଣେ : —
(୧) ଜେଵୀ ରୀତେ ଏକ ଗୂଢ ନାଗରସଗୁଟିକାମାଂ ସୋ ହଜାର ଲାଖ ଜେଟଲୀ ସଂଖ୍ଯାନୁଂ ସୁଵର୍ଣ ରହେ
ଛେ, (୨) ଅଥଵା ଜେଵୀ ରୀତେ ଏକ ଦୀଵାନା ପ୍ରକାଶମାଂ ଘଣା ଦୀଵାନୋ ପ୍ରକାଶ ଅଵକାଶ ପାମେ ଛେ, ଅଥଵା
प्राकृते कारकव्यभिचारो लिङ्गव्यभिचारश्च क्कचिद्भवतीति । कानि निवसन्ति ताइं पूर्वोक्त ानि
जीवादिषड्द्रव्याणीति । तद्यथा । यद्यप्युपचरितासद्भूतव्यवहारेणाधाराधेयभावेनैकक्षेत्रावगाहेन
तिष्ठन्ति तथापि शुद्धपारिणामिकपरमभावग्राहकेण शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन संकरव्यतिकरपरिहारेण
स्वकीयस्वकीयसामान्यविशेषशुद्धगुणान्न त्यजन्तीति । अत्राह प्रभाकरभट्टः । हे भगवन्
लोकस्तावदसंख्यातप्रदेशः परमागमे भणितः तिष्ठति तत्रासंख्यातप्रदेशलोके प्रत्येकं प्रत्येकम-
संख्येयप्रदेशान्यनन्तजीवद्रव्याणि, तत्र चैकैके जीवद्रव्ये कर्मनोकर्मरूपेणानन्तानि पुद्गलपरमाणु-
द्रव्याणि च तिष्ठन्ति तेभ्योऽप्यनन्तगुणानि शेषपुद्गलद्रव्याणि तिष्ठन्ति तानि सर्वाण्यसंख्येय-
प्रदेशलोके कथमवकाशं लभन्ते इति पूर्वपक्षः । भगवान् परिहारमाह । अवगाहनशक्ति योगादिति ।
तथाहि । यथैकस्मिन् गूढनागरसगद्याणके शतसहस्रलक्षसुवर्णसंख्याप्रमितान्यवकाशं लभन्ते,
अथवा यथैकस्मिन् प्रदीपप्रकाशे बहवोऽपि प्रदीपप्रकाशा अवकाशं लभन्ते, अथवा यथैकस्मिन्
भस्मघटे जलघटः सम्यगवकाशं लभन्ते, अथवा यथैकस्मिन् उष्ट्रीक्षीरघटे मधुघटः सम्यगवकाशं
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୫ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୪୯