Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
एक ऊ ँटनीके दूधके घड़ेमें शहदका घड़ा समा जाता है, अथवा एक भूमिघरमें ढोल, घण्टा
आदि बहुत बाजोंका शब्द अच्छी तरह समा जाता है, उसी तरह एक लोकाकाशमें विशिष्ट
अवगाहनशक्तिके योगसे अनंत जीव और अनन्तानन्त पुद्गल अवकाश पाते हैं, इसमें विरोध
नहीं है, और जीवोंमें परस्पर अवगाहनशक्ति है
ऐसा ही कथन परमागममें कहा है
‘‘एगणिगोद’’ इत्यादि इसका अर्थ ऐसा है कि एक निगोदिया जीवके शरीरमें जीवद्रव्यके
प्रमाणसे दिखलाये गये जितने सिद्ध हैं, उन सिद्धोंसे अनंत गुणे जीव एक निगोदियाके शरीरमें
हैं, और निगोदियाका शरीर अंगुलके असंख्यातवें भाग है, सो ऐसे सूक्ष्म शरीरमें अनंत जीव
समा जाते हैं, तो लोकाकाशमें समा जानेमें क्या अचंभा है ? अनंतानंत पुद्गल लोकाकाशमें
समा रहे हैं, उसकी ‘‘ओगाढ’’ इत्यादि गाथा है
उसका अर्थ यह है कि सब प्रकार सब
जगह यह लोक पुद्गल कायोंकर अवगाढ़गाढ़ भरा है, ये पुद्गल काय अनंत हैं; अनेक
प्रकारके भेदको धरते हैं, कोई सूक्ष्म हैं कोई बादर हैं
तात्पर्य यह है कि यद्यपि सब द्रव्य
(୩) ଜେଵୀ ରୀତେ ଏକ ରାଖନା ଘଡାମାଂ ପାଣୀନୋ ଘଡୋ ସାରୀ ରୀତେ ସମାଈ ଜାଯ ଛେ (ଜେଵୀ ରୀତେ ଘଡା
ଜେଟଲୀ ରାଖମାଂ ଘଡା ଜେଟଲୁଂ ପାଣୀ ପୂରତୁଂ ଶୋଷାଈ ଜାଯ ଛେ) ଅଥଵା (୪) ଜେଵୀ ରୀତେ ଏକ ଊଂଟଣୀନା
ଦୂଧନା ଘଡାମାଂ ମଧନୋ ଘଡୋ ସମାଈ ଜାଯ ଛେ ଅଥଵା (୫) ଜେଵୀ ରୀତେ ଏକ ଭୂମିଘରମାଂ (ଭୋଂଯରାମାଂ)
ଢୋଲ, ଜଯଜଯକାର ଅନେ ଘଂଟ ଵଗେରେନା ଅନେକ ଶବ୍ଦୋ ସାରୀ ରୀତେ ଅଵକାଶ ପାମେ ଛେ ତେଵୀ ରୀତେ ଏକ
ଜ ଲୋକମାଂ ଵିଶିଷ୍ଟ ଅଵଗାହନଶକ୍ତିନେ ଲୀଧେ ପୂର୍ଵୋକ୍ତ ଅନଂତ ସଂଖ୍ଯାଵାଳା ଜୀଵୋ ଅନେ ଅନଂତାନଂତ
ପୁଦ୍ଗଲୋ ଅଵକାଶ ପାମେ ଛେ, ଏମାଂ କୋଈ ଵିରୋଧ ନଥୀ. ପରମାଗମମାଂ (ଶ୍ରୀ ଗୋମ୍ମଟସାର ଜୀଵକାଂଡ ଗା.
୧୯୫ ମାଂ) ଜୀଵୋନୀ ଅଵଗାହନଶକ୍ତିନୁଂ ସ୍ଵରୂପ ପଣ କହ୍ଯୁଂ ଛେ କେ
‘‘एगणिगोदसरीरे जीवा दव्वप्पमाणदो
दिट्ठा सिद्धे हिं अणंतगुणा सव्वेण वितीदकालेण ।।’’ (ଅର୍ଥ:ଅତୀତକାଳମାଂ ଥଯେଲା ସର୍ଵ ସିଦ୍ଧୋଥୀ
ଦ୍ରଵ୍ଯପ୍ରମାଣଥୀ ଅନଂତଗୁଣା ଜୀଵୋ ଏକ ନିଗୋଦନା ଶରୀରମାଂ ଜୋଵାମାଂ ଆଵ୍ଯା ଛେ. ଵଳୀ ପଂଚାସ୍ତିକାଯ
ଗା. ୬୪ ମାଂ) ପୁଦ୍ଗଲୋନୀ ଅଵଗାହନଶକ୍ତିନୁଂ ସ୍ଵରୂପ ପଣ କହ୍ଯୁଂ ଛେ କେ
‘‘ओगाढ गाढणिचिदो पुग्गलकाएहिं
सव्वदो लोगो सुहुमेहिं बादरेहिं य णंताणंतेहिं विविहेहिं ।।’’ (ଅର୍ଥ:ଲୋକ ସର୍ଵତ: ଵିଵିଧ ପ୍ରକାରନା,
ଅନଂତାନଂତ ସୂକ୍ଷ୍ମ ତେମ ଜ ବାଦର ପୁଦ୍ଗଲକାଯୋ (ପୁଦ୍ଗଲସ୍କଂଧୋ) ଵଡେ [ଵିଶିଷ୍ଟ ରୀତେ] ଅଵଗାହାଈନେ ଗାଢ
लभते अथवा यथैकस्मिन् भूमिगृहे बहवोऽपि पटहजयघण्टादिशब्दाः सम्यगवकाशं लभन्ते,
तथैकस्मिन् लोके विशिष्टावगाहनशक्ति योगात् पूर्वोक्त ानन्तसंख्या जीवपुद्गला अवकाशं लभन्ते
नास्ति विरोधः इति
तथा चोक्तं जीवानामवगाहनशक्ति स्वरूपं परमागमे‘‘एगणिगोदसरीरे
जीवा दव्वप्पमाणदो दिट्ठा सिद्धे हिं अणंतगुणा सव्वेण वितीदकालेण ।।’’ पुनस्तथोक्तं
पुद्गलानामवगाहनशक्ति स्वरूपम्‘‘ओगाढगाढणिचिदो पुग्गलकाएहिं सव्वदो लोगो सुहुमेहिं
बादरेहिं य णंताणंतेहिं विविहेहिं ।।’’ अयमत्र भावार्थः यद्यप्येकावगाहेन तिष्ठन्ति तथापि
୨୫୦ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୫