Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଭାଵାର୍ଥ: — ପୁଦ୍ଗଲଦ୍ରଵ୍ଯ ତୋ, ସ୍ଵସଂଵେଦନଥୀ ଵିଲକ୍ଷଣ ଵିଭାଵପରିଣାମମାଂ ରତ ଜୀଵନେ
ଵ୍ଯଵହାରଥୀ ଶରୀର, ଵାଣୀ, ମନ ଅନେ ଶ୍ଵାସୋଚ୍ଛ୍ଵାସ ନିପଜାଵେ ଛେ ଅନେ ଧର୍ମଦ୍ରଵ୍ଯ ଉପଚରିତ ଅସଦ୍ଭୂତ
ଵ୍ଯଵହାରନଯଥୀ ଗତିମାଂ ସହକାରୀ ଛେ ତେମ ଜ ଅଧର୍ମଦ୍ରଵ୍ଯ ସ୍ଥିତିମାଂ ସହକାରୀ ଛେ, ତେ ଜ ଵ୍ଯଵହାରନଯଥୀ
(ଉପଚରିତ ଅସଦ୍ଭୂତଵ୍ଯଵହାରନଯଥୀ) ଆକାଶଦ୍ରଵ୍ଯ ଅଵକାଶଦାନ ଆପେ ଛେ ତେମ ଜ କାଳଦ୍ରଵ୍ଯ
ଶୁଭାଶୁଭ ପରିଣାମୋମାଂ ସହକାରୀ ଛେ.
ଏ ପ୍ରମାଣେ ପାଂଚ ଦ୍ରଵ୍ଯୋନେ ୧ଉପକାର (ଉଦାସୀନ ନିମିତ୍ତ) ପାମୀନେ ଜୀଵ ନିଶ୍ଚଯ-
ଵ୍ଯଵହାରରତ୍ନତ୍ରଯନୀ ଭାଵନାଥୀ ଭ୍ରଷ୍ଟ ଥଯେଲୋ ଚାର ଗତିନାଂ ଦୁଃଖନେ ସହେ ଛେ, ଏଵୋ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୨୬.
ହଵେ, ଏ ପ୍ରମାଣେ ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ପାଂଚ ଦ୍ରଵ୍ଯୋନୁଂ ସ୍ଵରୂପ ଦୁଃଖନୁଂ କାରଣ ଜାଣୀନେ ହେ
किं कुर्वन्ति । णियणियकज्जु जणंति निजनिजकार्यं जनयन्ति येन कारणेन निजनिजकार्यं
जनयन्ति । चउगइदुक्ख सहंत जिय चतुर्गतिदुःखं सहमानाः सन्तोजीवाः तें संसारु भमंति तेन
कारणेन संसारं भ्रमन्तीति । तथा च । पुद्गलस्तावज्जीवस्य स्वसंवित्तिलक्षणविभावपरिणामरतस्य
व्यवहारेण शरीरवाङ्मनःप्राणापाननिष्पत्तिं करोति, धर्मद्रव्यं चोपचरितासद्भूतव्यवहारेण
गतिसहकारित्वं करोति, तथैवाधर्मद्रव्यं स्थितिसहकारित्वं करोति, तेनैव व्यवहारनयेन
आकाशद्रव्यमवकाशदानं ददाति, तथैव कालद्रव्यं च शुभाशुभपरिणामसहकारित्वं करोति । एवं
पञ्चद्रव्याणामुपकारं लब्ध्वा जीवो निश्चयव्यवहाररत्नत्रयभावनाच्युतः सन् चतुर्गतिदुःखं सहत इति
भावार्थः ।।२६।।
अथैवं पञ्चद्रव्याणां स्वरूपं निश्चयेन दुःखकारणं ज्ञात्वा हे जीव निजशुद्धात्मो-
आत्मज्ञानसे विपरीत विभाव परिणामोंमें लीन हुए अज्ञानी जीवोंके व्यवहारनयकर शरीर, वचन,
मन, श्वासोश्वास, इन चारोंको उत्पत्ति करता है, अर्थात् मिथ्यात्व, अव्रत, कषाय, रागद्वेषादि
विभावपरिणाम हैं, इन विभाव परिणामोंके योगसे जीवके पुद्गलका सम्बन्ध हैं, और पुद्गलके
संबन्धसे ये हैं, धर्मद्रव्य उपचरितासद्भूत व्यवहारनयकर गतिसहायी है । अधर्मद्रव्य
स्थितिसहकारी है, व्यवहारनयकर आकाशद्रव्य अवकाश (जगह) देता है, और कालद्रव्य शुभ
-अशुभ परिणामोंका सहायी है । इस तरह ये पाँच द्रव्य सहकारी हैं । इनकी सहाय पाकर ये
जीव निश्चय व्यवहाररत्नत्रयकी भावनासे रहित भ्रष्ट होते हुए चारों गतियोंके दुःखोंको सहते
हुए संसारमें भटकते हैं, यह तात्पर्य हुआ ।।२६।।
आगे परद्रव्योंका संबंध निश्चयनयसे दुःखका कारण है, ऐसा जानकर हे जीव
୧. ଲୌକିକମାଂ ‘ଉପକାର’ ଅର୍ଥ ଅନ୍ଯନୁଂ ଭଲୁଂ କରଵୁଂ ଏଵୋ ଛେ ପଣ ତେ ତାତ୍ତ୍ଵିକ ଅର୍ଥ ନଥୀ. ‘ଉପକାର କରେ
ଛେ’ ଏନୋ ଅହୀଂ ତାତ୍ତ୍ଵିକ ଅର୍ଥ ଏ ଛେ କେ ‘ଉଦାସୀନ ନିମିତ୍ତ ଥାଯ ଛେ.’
୨୫୨ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୬