Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-27 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
पलम्भलक्षणे मोक्षमार्गे स्थीयत इति निरूपयति
१५३) दुक्खहँ कारणु मुणिवि जिय दव्वहँ एहु सहाउ
होयवि मोक्खहँ मग्गि लहु गम्मिज्जइ पर-लोउ ।।२७।।
दुःखस्य कारणं मत्वा जीव द्रव्याणां एतत्स्वभावम्
भूत्वा मोक्षस्य मार्गे लघु गम्यते परलोकः ।।२७।।
दुक्खहं कारणु दुःखस्य कारणं मुणिवि मत्वा ज्ञात्वा जिय हे जीव किं दुःखस्य कारणं
ज्ञात्वा दव्वहं एहु सहाउ द्रव्याणामिमं शरीरवाङ्मनःप्राणापाननिष्पत्त्यादिलक्षणं पूर्वोक्त स्वभावम्
एवं पुद्गलादिपञ्चद्रव्यस्वभावं दुःखस्य कारणं ज्ञात्वा किं क्रियते होयवि भूत्वा क्व मोक्खहं
मग्गि मोक्षस्य मार्गे लहु लघु शीघ्रं पश्चात् गम्मिज्जइ गम्यते कः कर्मतापन्नः पर-लोउ
परलोको मोक्ष इति तथाहि वीतरागसदानन्दैकस्वाभाविकसुखविपरीतस्याकुलत्वोत्पादकस्य
दुःखस्य कारणानि पुद्गलादिपञ्चद्रव्याणि ज्ञात्वा हे जीव भेदाभेदरत्नत्रयलक्षणे मोक्षस्य मार्गे
शुद्धात्माको प्राप्तिरूप मोक्षमार्गमें स्थित हो, ऐसा कहते हैं
गाथा२७
अन्वयार्थ :[जीव ] हे जीव, [द्रव्याणां इमं स्वभावम् ] परद्रव्योंके ये स्वभाव
[दुःखस्य ] दुःखके [कारणं मत्वा ] कारण जानकर [मोक्षस्य मार्गे ] मोक्षके मार्गमें [भूत्वा ]
लगकर [लघु ] शीघ्र ही [परलोकः गम्यते ] उत्कृष्ट लोकरूप मोक्षमें जाना चाहिये
भावार्थ :पहले कहे गये पुद्गलादि द्रव्योंके सहाय शरीर, वचन, मन,
श्वासोच्छ्वास आदिक ये सब दुःखके कारण हैं, क्योंकि वीतराग सदा आनंदरूप स्वभावकर
उत्पन्न जो अतिन्द्रिय सुख उससे विपरीत आकुलताके उपजानेवाले हैं, ऐसा जानकर हे जीव,
ଜୀଵ! ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାନୀ ପ୍ରାପ୍ତି ଜେନୁଂ ସ୍ଵରୂପ ଛେ ଏଵା ମୋକ୍ଷମାର୍ଗମାଂ ସ୍ଥିତ ଥା, ଏମ କହେ
ଛେ :
ଭାଵାର୍ଥ:ପୁଦ୍ଗଲାଦି ପାଂଚ ଦ୍ରଵ୍ଯୋନେ ଏକ (କେଵଳ) ଵୀତରାଗ ସଦାନଂଦରୂପ ସ୍ଵାଭାଵିକ
ସୁଖଥୀ ଵିପରୀତ ଆକୁଳତାନା ଉତ୍ପାଦକ ଅନେ ଦୁଃଖନା କାରଣୋ ଜାଣୀନେ ହେ ଜୀଵ! ମୋକ୍ଷନା
ଭେଦାଭେଦରତ୍ନତ୍ରଯସ୍ଵରୂପ ମାର୍ଗମାଂ ସ୍ଥିତ ଥଈନେ ପର ଅର୍ଥାତ୍ ପରମାତ୍ମା ତେନା ଅଵଲୋକନରୂପ-
୧. ପାଠାନ୍ତର :मोक्षस्य मार्गे = मोक्षमार्गे
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୭ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୫୩