Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-28 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
तू भेदाभेद रत्नत्रयस्वरूप मोक्षके मार्गमें लगकर परमात्माका अनुभव परमसमरसीभावसे
परिणमनरूप मोक्ष उसमें गमन कर
।।२७।।
आगे व्यवहारनयसे मैंने ये जीवादि द्रव्योंके श्रद्धानरूपको सम्यग्दर्शन कहा है, अब
सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रको हे प्रभाकरभट्ट; तू सुन, ऐसा मनमें रखकर यह दोहासूत्र कहते
हैं
गाथा२८
अन्वयार्थ :हे प्रभाकरभट्ट, [मया ] मैंने [व्यवहारेणैव ] व्यवहारनयसे तुझको [एषा
दृष्टिः ] ये सम्यग्दर्शनका स्वरूप [नियमेन कथिता ] अच्छी तरह कहा, [इदानीं ] अब तू
[ज्ञानं चारित्रं ] ज्ञान और चारित्रको [शृणु ] सुन, [येन ] जिसके धारण करनेसे [परमेष्ठिनम्
प्राप्नोषि ] सिद्धपरमेष्ठिके पदको पावेगा
भावार्थ :व्यवहारसम्यक्त्वके कारणभूत छह द्रव्योंका सांगोपांग व्याख्यान करते हैं
ଅନୁଭଵନରୂପ-ପରମସମରସୀଭାଵେ ପରିଣମନରୂପ-ପରଲୋକନୀ-ମୋକ୍ଷନୀ ତନେ ପ୍ରାପ୍ତି ଥାଯ. ୨୭.
ହଵେ, ଵ୍ଯଵହାରନଯଥୀ ମେଂ ଜୀଵଦ୍ରଵ୍ଯାଦି ଶ୍ରଦ୍ଧାନରୂପ ଆ ସମ୍ଯଗ୍ଦର୍ଶନ କହ୍ଯୁଂ, ହଵେ ହେ
ପ୍ରଭାକରଭଟ୍ଟ! ତୁଂ ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ ଅନେ ସମ୍ଯଗ୍ଚାରିତ୍ର ସାଂଭଳ, ଏମ ମନମାଂ ରାଖୀନେ ଆ ଦୋହାସୂତ୍ର କହେ
ଛେ :
ଭାଵାର୍ଥ:ହଵେ ଵ୍ଯଵହାରସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵନା ଵିଷଯଭୂତ ଦ୍ରଵ୍ଯୋନୁଂ ଚୂଲିକାରୂପେ (ସାଂଗୋପାଂଗ, ଵିଶେଷ
स्थित्वा परः परमात्मा तस्यावलोकनमनुभवनं परमसमरसीभावेन परिणमनं परलोको मोक्षस्तत्र
गम्यत इति भावार्थः
।।२७।।
अथेदं व्यवहारेण मया भणितं जीवद्रव्यादिश्रद्धानरूपं सम्यग्दर्शनमिदानीं सम्यग्ज्ञानं चारित्रं
च हे प्रभाकरभट्ट शृणु त्वमिति मनसि धृत्वा सूत्रमिदं प्रतिपादयति
१५४) णियमेँ कहियउ एहु मइँ ववहारेण वि दिट्ठि
एवहिँ णाणु चरित्तु सुणि जेँ पावहि परमेट्ठि ।।२८।।
नियमेन कथिता एषा मया व्यवहारेणापि द्रष्टिः
इदानीं ज्ञानं चारित्रं शृणु येन प्राप्नोषि परमेष्ठिनम् ।।२८।।
णियमें नियमेन निश्चयेन कहियउ कथिता एहु मइं एषा कर्मतापन्ना मया केनैव
୨୫୪ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୮