Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୮ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୫୯
च लोकव्याप्त्यपेक्षया जीवद्रव्यं तु पुनरेकैकजीवापेक्षया लोकपूरणावस्थां विहायासर्वगतंनाना-
जीवापेक्षया सर्वगतमेव भवतीति
पुद्गलद्रव्यं पुनर्लोकरूपमहास्कन्धापेक्षया सर्वगतं
शेषपुद्गलापेक्षया सर्वगतं न भवतीति कालद्रव्यं पुनरेककालाणुद्रव्यापेक्षया सर्वगतं न भवति
लोकप्रदेशप्रमाणनानाकालाणुविवक्षया लोके सर्वगतं भवति ‘इदरम्हि यपवेसो’ यद्यपि
सर्वद्रव्याणि व्यवहारेणैकक्षेत्रावगाहेनान्योन्यानुप्रवेशेन तिष्ठन्ति तथापि निश्चयनयेन
चेतनादिस्वकीयस्वकीयस्वरूपं न त्यजन्तीति
तथा चोक्त म्‘‘अण्णोण्णं पविसंता दिंता
ओगासमण्णमण्णस्स मेलंता वि य णिच्चं सगसब्भावं ण विजहंति ।।’’ इदमत्र तात्पर्यम्
ଜୀଵନୀ ଅପେକ୍ଷାଏ କେଵଳୀ ସମୁଦ୍ଘାତମାଂ ଲୋକପୂରଣନୀ ଅଵସ୍ଥାନେ ଛୋଡୀନେ ଅସର୍ଵଗତ ଛେ, ଅନେକ
ଜୀଵନୀ ଅପେକ୍ଷାଏ, ସର୍ଵଗତ ଜ ଛେ. ଵଳୀ ପୁଦ୍ଗଲଦ୍ରଵ୍ଯ ଲୋକରୂପ ମହାସ୍କଂଧନୀ ଅପେକ୍ଷାଏ ସର୍ଵଗତ
ଛେ, ବାକୀନା ପୁଦ୍ଗଲନୀ ଅପେକ୍ଷାଏ ସର୍ଵଗତ ନଥୀ, ଵଳୀ କାଳଦ୍ରଵ୍ଯ ଏକ ଏକ କାଳାଣୁଦ୍ରଵ୍ଯନୀ ଅପେକ୍ଷାଏ
ସର୍ଵଗତ ନଥୀ, ଲୋକନା ପ୍ରଦେଶୋ ଜେଟଲା ଅନେକ କାଳାଣୁନୀ ଵିଵକ୍ଷାଥୀ ଲୋକମାଂ ସର୍ଵଗତ ଛେ.
(୧୨) ‘इदरम्हि यपवेसोइदरम्हि यपवेसो ଜୋକେ ସର୍ଵ ଦ୍ରଵ୍ଯୋ ଵ୍ଯଵହାରନଯଥୀ ଏକକ୍ଷେତ୍ରାଵଗାହେ-କରୀନେ ଏକ
ବୀଜାମାଂ ପ୍ରଵେଶୀନେ ରହେ ଛେ ତୋପଣ ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ଚେତନାଦି ପୋତପୋତାନୁଂ ସ୍ଵରୂପ ଛୋଡତାଂ ନଥୀ. (ଶ୍ରୀ
ପଂଚାସ୍ତିକାଯ ଗାଥା ୭ମାଂ) କହ୍ଯୁଂ ପଣ ଛେ କେ
‘‘अण्णोण्णं पविसंता दिंता ओगासमण्णस्स मेलंता वि
य णिच्चं सगं सब्भावं ण विजहंति ।। (ଅର୍ଥ:ତେଓ (ଛଏ ଦ୍ରଵ୍ଯୋ) ଏକ ବୀଜାମାଂ ପ୍ରଵେଶ କରେ ଛେ,
ଅନ୍ଯୋନ୍ଯ ଅଵକାଶ ଆପେ ଛେ ପରସ୍ପର (କ୍ଷୀର ନୀରଵତ୍) ମଳୀ ଜାଯ ଛେ ତୋପଣ ସଦା ପୋତପୋତାନା
ସ୍ଵଭାଵନେ ଛୋଡତାଂ ନଥୀ.)
महास्कंधकी अपेक्षा सर्वगत है, अन्य पुद्गलकी अपेक्षा सर्वगत नहीं है, कालद्रव्य एक
कालाणुकी अपेक्षा तो एकप्रदेशगत है, सर्वगत नहीं है, और नाना कालाणुकी अपेक्षा
लोकाकाशके सब प्रदेशोंमें कालाणु है, इसलिये सब कालाणुओंकी अपेक्षा सर्वगत कह सकते
हैं
इस नयविवक्षासे सर्वगतपनेका व्याख्यान किया और मुख्यवृत्तिसे विचारा जावे, तो
सर्वगतपना आकाशमें ही है, अथवा ज्ञानकी अपेक्षा जीवमें भी है, जीवका केवलज्ञान लोकालोक
व्यापक है, इसलिये सर्वगत कहा
ये सब द्रव्य यद्यपि व्यवहारनयकर एक क्षेत्रावगाही रहते
हैं, तो भी निश्चयनयकर अपने अपने स्वभावको नहीं छोड़ते, दूसरे द्रव्यमें जिनका प्रवेश नहीं
है, सभी द्रव्य निज निज स्वरूपमें हैं, पररूप नहीं हैं
कोई किसीका स्वभाव नहीं लेता ऐसा
ही कथन श्रीपंचास्तिकायमें है ‘‘अण्णोण्णं’’ इत्यादि इसका अर्थ ऐसा है, कि यद्यपि ये छहों
द्रव्य परस्परमें प्रवेश करते हुए देखे जाते हैं, तो भी कोई किसीमें प्रवेश नहीं करता, यद्यपि
अन्यको अन्य अवकाश देता है, तो भी अपना अपना अवकाश आपमें ही है, परमें नहीं है,
यद्यपि ये द्रव्य हमेशासे मिल रहे हैं, तो भी अपने स्वभावको नहीं छोड़ते
यहाँ तात्पर्य यह