Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-29 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୨୬୦ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୯
व्यवहारसम्यक्त्वविषयभूतेषु षड्द्रव्येषु मध्ये वीतरागचिदानन्दैकादिगुणस्वभावं शुभाशुभमनोवचन-
कायव्यापाररहितं निजशुद्धात्मद्रव्यमेवोपादेयम्
।।२८।। एवमेकोनविंशतिसूत्रप्रमितस्थले निश्चय-
व्यवहारमोक्षमार्गप्रतिपादकत्वेन पूर्वसूत्रत्रयं गतम् इदं पुनरन्तरं स्थलं चतुर्दशसूत्रप्रमितं
षड्द्रव्यध्येयभूतव्यवहारसम्यक्त्वव्याख्यानमुख्यत्वेन समाप्तमिति
अथ संशयविपर्ययानध्यवसायरहितं सम्यग्ज्ञानं प्रकटयति
१५५) जं जह थक्कउ दव्वु जिय तं तह जाणइ जो जि
अप्पहं केरउ भावडउ णाणु मुणिज्जहि सो जि ।।२९।।
यद् यथा स्थितं द्रव्यं जीव तत् तथा जानाति य एव
आत्मनः संबन्धी भावः ज्ञानं मन्यस्व स एव ।।२९।।
ଅହୀଂ, ଆ ତାତ୍ପର୍ଯ ଛେ କେ ଵ୍ଯଵହାରସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵନାଂ ଵିଷଯଭୂତ ଛ ଦ୍ରଵ୍ଯୋମାଂ ଏକ (କେଵଳ) ଵୀତରାଗ
ଚିଦାନଂଦ ଆଦି ଅନଂତଗୁଣସ୍ଵରୂପ, ଶୁଭାଶୁଭ ମନ, ଵଚନ, କାଯାନା ଵ୍ଯାପାରଥୀ ରହିତ ଏକ
ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମଦ୍ରଵ୍ଯ ଜ ଉପାଦେଯ ଛେ. ୨୮.
ଏ ପ୍ରମାଣେ ଓଗଣୀସ ଗାଥାସୂତ୍ରୋନା ସ୍ଥଳମାଂ ନିଶ୍ଚଯଵ୍ଯଵହାରମୋକ୍ଷମାର୍ଗନା କଥନନୀ ମୁଖ୍ଯତାଥୀ
ପୂର୍ଵନା ତ୍ରଣ ସୂତ୍ରୋ ସମାପ୍ତ ଥଯାଂ. ଅନେ ଆ ଚୌଦ ସୂତ୍ରୋନୁଂ ଅନ୍ତରସ୍ଥଳ, ଛ ଦ୍ରଵ୍ଯୋ ଜେନୁଂ ଧ୍ଯେଯ ଛେ (ଜେନୋ
ଵିଷଯ ଛେ) ଏଵା ଵ୍ଯଵହାର ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵନାଂ ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନନୀ ମୁଖ୍ଯତାଥୀ ସମାପ୍ତ ଥଯୁଂ.
ହଵେ ସଂଶଯ, ଵିପର୍ଯଯ ଅନେ ଅଧ୍ଯଵସାଯ ରହିତ ଜେ ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ ଛେ, ତେନେ ପ୍ରଗଟ କରେ ଛେ :
है, कि व्यवहारसम्यक्त्वके कारण छह द्रव्योंमें वीतराग चिदानंद अनंत गुणरूप जो शुद्धात्मा है,
वह शुभ, अशुभ, मन, वचन, कायके व्यापारसे रहित हुआ ध्यावने योग्य है
।।२८।।
इसप्रकार उन्नीस दोहोंके स्थलमें निश्चय व्यवहार मोक्षमार्गके कथनकी मुख्यतासे तीन
दोहा कहे ऐसे चौदह दोहों तक व्यवहारसम्यक्त्वका व्याख्यान किया, जिसमें छह द्रव्योंका
श्रद्धान मुख्य है
आगे संशय विमोह विभ्रम रहित जो सम्यग्ज्ञान है, उसका स्वरूप प्रगट करते हैं
गाथा२९
अन्वयार्थ :[जीव ] हे जीव; [यत् ] ये सब द्रव्य [यथा स्थितं ] जिस तरह
अनादिकालके तिष्ठे हुए हैं, जैसा इनका स्वरूप है, [तत् तथा ] उनको वैसा ही संशयादि
୧. ପାଠାନ୍ତର :पुनरन्तरं स्थलं = पुनरन्तरस्थलं