Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୯ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୬୧
जं इत्यादि । जं यत् जह यथा थक्कउ स्थितं दव्वु द्रव्यं जिय हे जीव तं तत् तह तथा
जाणइ जानाति जो जि य एव । य एव कः । अप्पहं केरउ भावडउ आत्मनः संबन्धी भावः
परिणामः णाणु मुणिज्जहि ज्ञानं मन्यस्व जानीहि सो जि स एव पूर्वोक्त आत्मपरिणाम इति । तथा
च यद् द्रव्यं यथा स्थितं सत्तालक्षणं उत्पादव्ययध्रौव्यलक्षणं वा गुणपर्यायलक्षणं वा सप्त-
भङ्गयात्मकं वा तत् तथा जानाति य आत्मसंबन्धी स्वपरिच्छेदको भावः परिणामस्तत् सम्यग्-
ज्ञानं भवति । अयमत्र भावार्थः । व्यवहारेण सविकल्पावस्थायां तत्त्वविचारकाले स्वपरपरिच्छेदकं
ज्ञानं भण्यते । निश्चयनयेन पुनर्वीतरागनिर्विकल्पसमाधिकाले बहिरुपयोगो यद्यप्यनीहितवृत्त्या
निरस्तस्तथापीहापूर्वकविकल्पाभावाद्गौणत्वमितिकृत्वा स्वसंवेदनज्ञानमेव ज्ञानमुच्यते ।।२९।।
अथ स्वपरद्रव्यं ज्ञात्वा रागादिरूपपरद्रव्यविषयसंकल्पविकल्पत्यागेन स्वस्वरूपे अवस्थानं
ଭାଵାର୍ଥ: — ଜେ ଦ୍ରଵ୍ଯ ଜେଵୀ ରୀତେ ସ୍ଥିତ ଛେ ତେଵୀ ରୀତେ ଅର୍ଥାତ୍ ଜେ ସତ୍ତାସ୍ଵରୂପ ଛେ,
ଉତ୍ପାଦଵ୍ଯଯଧ୍ରୌଵ୍ଯସ୍ଵରୂପ ଛେ ଅଥଵା ଗୁଣପର୍ଯାଯସ୍ଵରୂପ ଛେ ଅଥଵା ସପ୍ତ ଭଂଗୀସ୍ଵରୂପ ଛେ ତେଵୀ ରୀତେ ତେନେ
ଜେ ଆତ୍ମାନୋ ସ୍ଵ-ପରପରିଚ୍ଛେଦକ ଭାଵ-ପରିଣାମ-ଜାଣେ ଛେ, ତେ ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ ଛେ.
ଅହୀଂ, ଏ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ କେ ଵ୍ଯଵହାରନଯଥୀ ସଵିକଲ୍ପ-ଅଵସ୍ଥାମାଂ ତତ୍ତ୍ଵନା ଵିଚାରକାଳେ
ସ୍ଵପରିଚ୍ଛେଦକ ଜ୍ଞାନନେ ଜ୍ଞାନ କହେଵାମାଂ ଆଵେ ଛେ; ଅନେ ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ଵୀତରାଗନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସମାଧିନା
କାଳେ, ଜୋକେ ବହିର ଉପଯୋଗ ଅନୀହିତ ଛେ ଖରୋ ତୋପଣ ଇହାପୂର୍ଵକ ଵିକଲ୍ପନୋ ଅଭାଵ ହୋଵାନେ ଲୀଧେ
ତେନୁଂ ଗୌଣପଣୁଂ ହୋଵାଥୀ ସ୍ଵସଂଵେଦନଜ୍ଞାନନେ ଜ ଜ୍ଞାନ କହେଵାମାଂ ଆଵେ ଛେ. ୨୯.
ହଵେ, ସ୍ଵ-ପରଦ୍ରଵ୍ଯନେ ଜାଣୀନେ ରାଗାଦିରୂପ ଜେ ପରଦ୍ରଵ୍ଯନା ସଂକଲ୍ପ-ଵିକଲ୍ପନୋ ତ୍ଯାଗ କରୀନେ
रहित [य एव जानाति ] जो जानता है, [स एव ] वही [आत्मनः संबंधी भावः ] आत्माका
निजस्वरूप [ज्ञानं ] सम्यग्ज्ञान है, ऐसा [मन्यस्व ] तू मान ।
भावार्थ : — जो द्रव्य है, वह सत्ता लक्षण है, उत्पाद व्यय ध्रौव्यरूप है, और सभी
द्रव्य गुण पर्यायको धारण करते हैं, गुण पर्यायके बिना कोई नहीं हैं । अथवा सब ही द्रव्य
सप्तभंगीस्वरूप हैं, ऐसा द्रव्योंका स्वरूप जो निःसंदेह जाने, आप और परको पहचाने, ऐसा
जो आत्माका भाव (परिणाम) वह सम्यग्ज्ञान है । सारांश यह है, कि व्यवहारनयकर विकल्प
सहित अवस्थामें तत्त्वके विचारके समय आप और परका जानपना ज्ञान कहा है, और
निश्चयनयकर वीतराग निर्विकल्प समाधिसमय पदार्थोंका जानपना मुख्य नहीं लिया, केवल
स्वसंवेदनज्ञान ही निश्चयसम्यग्ज्ञान है । व्यवहारसम्यग्ज्ञान तो परम्पराय मोक्षका कारण है, और
निश्चयसम्यग्ज्ञान साक्षात् मोक्षका कारण है ।।२९।।
आगे निज और परद्रव्यको जानकर रागादिरूप जो परद्रव्यमें संकल्प-विकल्प हैं, उनके