Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୨୭୦ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୩୩
आत्मन्येवाधिकरणभूते असौ पूर्वोक्त ात्मा आत्मना करणभूतेन क्षणमन्तर्मुहूर्तमात्रं उपजनयन्
निर्विकल्पसमाधिनाराधयन् स स्वयंभूः प्रवृत्तः सर्वज्ञो जात इत्यर्थः
ये च तत्र
द्रव्यभावपरमाणुध्येयलक्षणे शुक्लध्याने द्वयाधिकचत्वारिंशद्विकल्पा भणितास्तिष्ठन्ति ते
पुनरनीहितवृत्त्या ग्राह्याः
केन द्रष्टान्तेनेति चेत् यथा प्रथमौपशमिकसम्यक्त्वग्रहणकाले
परमागमप्रसिद्धाधःप्रवृत्तिकरणादिविकल्पान् जीवः करोति न चात्रेहादिपूर्वकत्वेन स्मरणमस्ति
तथात्र शुक्लध्याने चेति
इदमत्र तात्पर्यम् प्राथमिकानां चित्तस्थितिकरणार्थं विषय-
कषायदुर्ध्यानवञ्चनार्थं च परंपरया मुक्ति कारणमर्हदादिपरद्रव्यं ध्येयम्, पश्चात् चित्ते स्थिरीभूते
साक्षान्मुक्ति कारणं स्वशुद्धात्मतत्त्वमेव ध्येयं नास्त्येकान्तः, एवं साध्यसाधकभावं ज्ञात्वा ध्येयविषये
ଅନ୍ତର୍ମୁହୂର୍ତମାତ୍ର ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସମାଧି ଵଡେ ଆରାଧତୋ ଥକୋ ସ୍ଵଯଂଭୂ ଥାଯ ଛେସର୍ଵଜ୍ଞ ଥାଯ ଛେ.
ଦ୍ରଵ୍ଯଭାଵପରମାଣୁଂ (ଦ୍ରଵ୍ଯସୂକ୍ଷ୍ମପଣୁଂ ଅନେ ଭାଵସୂକ୍ଷ୍ମପଣୁଂ) ଧ୍ଯେଯସ୍ଵରୂପେ ହୋଯ ଛେ ଏଵା ଶୁକ୍ଲଧ୍ଯାନମାଂ
ସିଦ୍ଧାଂତମାଂ ଜେ ବେତାଲୀଶ ଭେଦୋ କହ୍ଯା ଛେ ତେ ପଣ ଅନୀହିତ ଵୃତ୍ତିଥୀ ସମଜଵା. କ୍ଯା ଦ୍ରଷ୍ଟାଂତଥୀ? ଏଵା
ପ୍ରଶ୍ନନା ଉତ୍ତରମାଂ ତେନୁଂ ଦ୍ରଷ୍ଟାଂତ ଆପଵାମାଂ ଆଵେ ଛେ.
ଜେଵୀ ରୀତେ ପ୍ରଥମ ଔପଶମିକ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵନା ଗ୍ରହଣ ସମଯେ ପରମାଗମମାଂ ପ୍ରସିଦ୍ଧ
ଅଧଃପ୍ରଵୃତ୍ତିକରଣାଦି ଭେଦୋନେ ଜୀଵ କରେ ଛେ ପଣ ଅହୀଂ ଇହାଆଦିପୂର୍ଵକପଣାଥୀ ହୋତୁଂ ନଥୀ, ତେଵୀ ରୀତେ
ଅହୀଂ ଶୁକ୍ଲଧ୍ଯାନମାଂ ପଣ ସମଜଵୁଂ.
ଅହୀଂ, ଆ ତାତ୍ପର୍ଯ ଛେ କେ ପ୍ରାଥମିକ ଜୀଵୋନେ ଚିତ୍ତନେ ସ୍ଥିର କରଵା ମାଟେ ଅନେ ଵିଷଯକଷାଯରୂପ
ଦୁର୍ଧ୍ଯାନନୀ ଵଂଚନାର୍ଥେ ପରଂପରାଏ ମୁକ୍ତିନୁଂ କାରଣ ଏଵୁଂ ଅର୍ହଂତାଦି ପରଦ୍ରଵ୍ଯ ଧ୍ଯାଵଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ, ପଛୀ ଚିତ୍ତ
ଜ୍ଯାରେ ସ୍ଥିର ଥାଯ ତ୍ଯାରେ ସାକ୍ଷାତ୍ ମୁକ୍ତିନୁଂ କାରଣ ଏଵୁଂ ସ୍ଵଶୁଦ୍ଧାତ୍ମତତ୍ତ୍ଵ ଜ ଧ୍ଯାଵଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ, ତ୍ଯାଂ
एक क्षणमात्र भी निर्विकल्प समाधिकर आराधता हुआ वह सर्वज्ञ वीतराग हो जाता है जिस
शुक्लध्यानमें द्रव्यपरमाणुकी सूक्ष्मता और भावपरमाणुकी सूक्ष्मता ध्यान करने योग्य है, ऐसे
शुक्लध्यानमें निजवस्तु और निजभावका ही सहारा है, परवस्तुका नहीं
सिद्धान्तमें
शुक्लध्यानके ब्यालीस भेद कहे हैं, वे अवाँछीक वृत्तिसे गौणरूप जानना, मुख्य वृत्तिसे न
जानना
उसका दृष्टांतजैसे उपशमसम्यक्त्वके ग्रहणके समय परमागममें प्रसिद्ध जो
अधःकरणादि भेद हैं, उनको जीव करता है, वे वाँछापूर्वक नहीं होते, सहज ही होते हैं, वैसे
ही शुक्लध्यानमें भी ऐसे ही जानना
तात्पर्य यह है कि प्रथम अवस्थामें चित्तके थिर करनेके
लिए और विषयकषायरूप खोटे ध्यानके रोकनेके लिये परम्पराय मुक्तिके कारणरूप अरहंत
आदि पंचपरमेष्ठी ध्यान करने योग्य है, बादमें चित्तके स्थिर होने पर साक्षात् मुक्तिका कारण
जो निज शुद्धात्मतत्त्व है, वही ध्यावने योग्य है
इसप्रकार साध्यसाधकभावको जानकर
ध्यावने योग्य वस्तुमें विवाद नहीं करना, पंचपरमेष्ठीका ध्यान साधक है, और आत्मध्यान