Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୩୮ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୭୯
रागादिरहितमनसि विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावनिजशुद्धात्मसंवित्तिं न त्यजति स पुरुष एवाभेदनयेन
द्रव्यभावरूपपुण्यपापसंवरस्य हेतुः कारणं भवतीति ।।३७।।
अथ यावन्तं कालं रागादिरहितपरिणामेन स्वशुद्धात्मस्वरूपे तन्मयो भूत्वा तिष्ठति तावन्तं
कालं संवरनिर्जरे करोतीति प्रतिपादयति —
१६४) अच्छइ जित्तिउ कालु मुणि अप्प – सरूवि णिलीणु ।
संवर – णिज्जर जाणि तुहुं सयल – वियप्प – विहीणु ।।३८।।
तिष्ठति यावन्तं कालं मुनिः आत्मस्वरूपे निलीनः ।
संवरनिर्जरां जानीहि त्वं सकलविकल्पविहीनम् ।।३८।।
– ରାଗଦ୍ଵେଷମୋହରହିତ ପରିଣାମନେ-କରେ ଛେ ଅର୍ଥାତ୍ ସହଜ ଶୁଦ୍ଧ ଜ୍ଞାନାନଂଦ ଜ ଜେନୁଂ ଏକ ରୂପ ଛେ ଏଵା,
ରାଗଦ୍ଵେଷମୋହରହିତ ପରିଣାମମାଂ ପରିଣମେ ଛେ ତେ କାରଣେ ତେ ମୁନି ପୁଣ୍ଯ ଅନେ ପାପ ଏ ବନ୍ନେନା ସଂଵରନୋ
ହେତୁ ଥାଯ ଛେ.
ଅହୀଂ, ଆ ତାତ୍ପର୍ଯ ଛେ କେ କର୍ମୋଦଯ ଵଶେ ସୁଖ-ଦୁଃଖ ଉତ୍ପନ୍ନ ଥଵା ଛତାଂ ପଣ, ଜେ କୋଈ
ରାଗାଦିଥୀ ରହିତ ଏଵା ମନମାଂ ଵିଶୁଦ୍ଧଜ୍ଞାନ, ଵିଶୁଦ୍ଧଦର୍ଶନ ଜେନୋ ସ୍ଵଭାଵ ଛେ ଏଵା ନିଜ ଶୁଦ୍ଧ
ଆତ୍ମାନା ସଂଵେଦନନେ ଛୋଡତୋ ନଥୀ ତେ ପୁରୁଷ ଜ ଅଭେଦନଯଥୀ ଦ୍ରଵ୍ଯଭାଵରୂପ ପୁଣ୍ଯ-ପାପନା ସଂଵରନୁଂ
କାରଣ ଥାଯ ଛେ. ୩୭.
ହଵେ, ମୁନି ଜେଟଲୋ ସମଯ ରାଗ-ଦ୍ଵେଷ ରହିତ ପରିଣାମ ଵଡେ ସ୍ଵଶୁଦ୍ଧାତ୍ମ ସ୍ଵରୂପମାଂ ତନ୍ମଯ ଥଈନେ
ରହେ ଛେ ତେଟଲୋ ଜ କାଳ ସଂଵରନିର୍ଜରା କରେ ଛେ, ଏମ କହେ ଛେ : —
मनमें शुद्ध ज्ञानदर्शनस्वरूप अपने निज शुद्ध स्वरूपको नहीं छोड़ता है, वही पुरुष अभेदनयकर
द्रव्य भावरूप पुण्य-पापके संवरका कारण है ।।३७।।
आगे जिस समय जितने काल तक रागादि रहित परिणामोंकर निज शुद्धात्मस्वरूपमें
तन्मय हुआ ठहरता है, तब तक संवर और निर्जराको करता है, ऐसा कहते हैं —
गाथा – ३८
अन्वयार्थ : — [मुनिः ] मुनिराज [यावंतं कालं ] जबतक [आत्मस्वरूपे निलीनः ]
आत्मस्वरूपमें लीन हुआ [तिष्ठति ] रहता है, अर्थात् वीतराग नित्यानंद परम समरसीभावकर
परिणमता हुआ अपने स्वभावमें तल्लीन होता है, उस समय हे प्रभाकरभट्ट; [त्वं ] तू
[सकलविकल्पविहीनम् ] समस्त विकल्प समूहोंसे रहित अर्थात् ख्याति (अपनी बड़ाई) पूजा