Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-39 (Adhikar 2) Param Upashamabhavni Mukhyata.

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୨୮୦ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୩୮
अत्थ(च्छ)इ इत्यादि अत्थ(च्छ)इ तिष्ठति किं कृत्वा तिष्ठति जित्तिउ कालु यावन्तं
कालं प्राप्य क्व तिष्ठति अप्प-सरूवि निजशुद्धात्मस्वरूपे कथंभूतः सन् णिलीणु निश्चयनयेन
लीनो द्रवीभूतो वीतरागनित्यानन्दैकपरमसमरसीभावेन परिणतः हे प्रभाकरभट्ट
इत्थंभूतपरिणामपरिणतं तपोधनमेवाभेदेन
संवर-णिज्जर जाणि तुहुँ संवरनिर्जरास्वरूपं जानीहि
त्वम्
पुनरपि कथंभूतम् सयल-वियप्प-विहीणु सकलविकल्पहीनं ख्यातिपूजालाभप्रभृति-
विकल्पजालावलीरहितमिति अत्र विशेषव्याख्यानं यदेव पूर्वसूत्रद्वयभणितं तदेव ज्ञातव्यम्
कस्मात् तस्यैव निर्जरासंवरव्याख्यानस्योपसंहारोऽयमित्यभिप्रायः ।।३८।। एवं मोक्षमोक्षमार्गमोक्ष-
फ लादिप्रतिपादकद्वितीयमहाधिकारोक्तसूत्राष्टकेनाभेदरत्नत्रयव्याख्यानमुख्यत्वेन स्थलं समाप्तम्
अत ऊर्ध्वं चतुर्दशसूत्रपर्यन्तं परमोपशमभावमुख्यत्वेन व्याख्यानं करोति
तथाहि
१६५) कम्मु पुरक्किउ सो खवइ अहिणव पेसु ण देइ
संगु मुएविणु जो सयलु उवसम-भाउ करेइ ।।३९।।
ଭାଵାର୍ଥ:ମୁନି ଜେଟଲୋ କାଳ ନିଜ ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମସ୍ଵରୂପମାଂ ନିଶ୍ଚଯଥୀ ଲୀନ ଥଈନେ ଦ୍ରଵୀଭୂତ
ଥଈନେ ଏକ (କେଵଳ) ଵୀତରାଗ ନିତ୍ଯାନଂଦରୂପ ପରମସମରସୀଭାଵେ ପରିଣମେଲୋ ରହେ ଛେ, ତେଟଲା କାଳସୁଧୀ
ତୁଂ ଆଵା ପରିଣାମରୂପେ ପରିଣମେଲା, ସଂକଲ୍ପ-ଵିକଲ୍ପଥୀ ରହିତ ଖ୍ଯାତିପୂଜାଲାଭଆଦିନା ଵିକଲ୍ପନୀ
ଜାଳାଵଲୀଥୀ ରହିତ-ତପୋଧନନେ ସଂଵରନିର୍ଜରାସ୍ଵରୂପ ଜାଣ.
ଜେ ଵିଶେଷ ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନ ପୂର୍ଵନା ବେ ଗାଥାସୂତ୍ରୋମାଂ କହ୍ଯୁଂ ଛେ ତେ ଜ ଅତ୍ରେ ଜାଣଵୁଂ, କାରଣ କେ ତେ
ଜ ସଂଵର ଅନେ ନିର୍ଜରାନା ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନନୋ ଉପସଂହାର ଛେ, ଏଵୋ ଅଭିପ୍ରାଯ ଛେ. ୩୮.
ଆ ପ୍ରମାଣେ ମୋକ୍ଷ, ମୋକ୍ଷମାର୍ଗ ଅନେ ମୋକ୍ଷଫଳଆଦିନା ପ୍ରତିପାଦକ ବୀଜା ମହାଧିକାରମାଂ କହେଲ
ଆଠ ସୂତ୍ରୋଥୀ ଅଭେଦରତ୍ନତ୍ରଯନା ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନନୀ ମୁଖ୍ଯତାଥୀ (ଅଂତର) ସ୍ଥଳ ସମାପ୍ତ ଥଯୁଂ.
(अपनी प्रतिष्ठा) लाभको आदि देकर विकल्पोंसे रहित उस मुनिको [संवरनिर्जरा ] संवर
निर्जरा स्वरूप [जानीहि ] जान
यहाँ पर भावार्थरूप विशेष व्याख्यान जो कि पहले दो सूत्रोंमें
कहा था, वही जानो इसप्रकार संवर निर्जराका व्याख्यान संक्षेपरूपसे कहा गया है ।।३८।।
इस तरह मोक्ष, मोक्षमार्ग और मोक्षफ लका निरूपण करनेवाले दूसरे महाधिकारमें
आठ दोहासूत्रोंसे अभेदरत्नत्रयके व्याख्यानकी मुख्यतासे अंतरस्थल पूरा हुआ
आगे चौदह दोहोंमें परम उपशमभावकी मुख्यतासे व्याख्यान करते हैं