Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୩୯ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୮୧
कर्म पुराकृतं स क्षपयति अभिनवं प्रवेशं न ददाति
संगं मुक्त्वा यः सकलं उपशमभावं करोति ।।३९।।
कम्मु इत्यादि कम्मु पुरक्किउ कर्म पुराकृतं सो खवइ स एव
वीतरागस्वसंवेदनतत्त्वज्ञानी क्षपयति पुनरपि किं करोति अहिणव पेसु ण देइ अभिनवं
कर्म प्रवेशं न ददाति स कः संगु मुएविणु जो सयलु संगं बाह्याभ्यन्तरपरिग्रहं मुक्त्वा
यः कर्ता समस्तम् पश्चात्किं करोति उवसम भाउ करेइ जीवितमरणलाभालाभसुख-
दुःखादिसमताभावलक्षणं समभावं करोति तद्यथा स एव पुराकृतं कर्म क्षपयति नवतरं
संवृणोति य एव बाह्याभ्यन्तरपरिग्रहं मुक्त्वा सर्वशास्त्रं पठित्वा च शास्त्रफ लभूतं वीतराग-
परमानन्दैकसुखरसास्वादरूपं समभावं करोतीति भावार्थः
तथा चोक्त म्‘‘साम्यमेवाद-
राद्भाव्यं किमन्यै र्ग्रन्थविस्तरैः प्रक्रियामात्रमेवेदं वाङ्मयं विश्वमस्य हि ।।’’ ।।३९।।
ତ୍ଯାର ପଛୀ ଚୌଦ ଗାଥା ସୂତ୍ର ସୁଧୀ ପରମ ଉପଶମଭାଵନୀ ମୁଖ୍ଯତାଥୀ ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନ କରେ ଛେ. ତେ
ଆ ପ୍ରମାଣେ :
ଭାଵାର୍ଥ:ତେ ଜ ପୂର୍ଵକୃତ କର୍ମୋନେ ଖପାଵେ ଛେ ଅନେ ନଵାଂ କର୍ମୋନେ ରୋକେ ଛେ କେ ଜେ
ବାହ୍ଯ-ଅଭ୍ଯଂତର ପରିଗ୍ରହନେ ଛୋଡୀନେ ଅନେ ସର୍ଵ ଶାସ୍ତ୍ର ଭଣୀନେ ଶାସ୍ତ୍ରନା ଫଳଭୂତ ଏକ (କେଵଳ)
ଵୀତରାଗ ପରମାନଂଦରୂପ ସୁଖରସନା ଆସ୍ଵାଦରୂପ ସମଭାଵନେ କରେ ଛେ. କହ୍ଯୁଂ ପଣ ଛେ କେ
‘‘साम्यमेवादराद्भाव्यं किमन्यैैर्ग्रन्थविस्तरैः प्रक्रियामात्रमेवेदं वाङ्मयं विश्वमस्य हि ।।’’ [ଅର୍ଥ:ଏକ
ସମଭାଵ ଜ ଆଦରଥୀ ଭାଵଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ, ଅନ୍ଯ ଗ୍ରଂଥୋନା ଵିସ୍ତାରୋଥୀ ଶୁଂ? ଆ ସମସ୍ତ
गाथा३९
अन्वयार्थ :[सः ] वही वीतराग स्वसंवेदन ज्ञानी [पुराकृतं कर्म ] पूर्व उपार्जित
कर्मोंको [क्षपयति ] क्षय करता है, और [अभिनवं ] नये कर्मोंको [प्रवेशं ] प्रवेश [न
ददाति ] नहीं होने देता, [यः ] जो कि [सकलं ] सब [संगं ] बाह्य अभ्यंतर परिग्रहको
[मुक्त्वा ] छोड़कर [उपशमभावं ] परम शांतभावको [करोति ] करता है, अर्थात् जीवन,
मरण, लाभ, अलाभ, सुख, दुःख, शत्रु, मित्र, तृण, कांचन इत्यादि वस्तुओंमें एकसा परिणाम
रखता है
भावार्थ :जो मुनिराज सकल परिग्रहको छोड़कर सब शास्त्रोंका रहस्य जानके
वीतराग परमानंद सुखरसका आस्वादी हुआ समभाव करता है, वही साधु पूर्वके कर्मोंका क्षय
करता है, और नवीन कर्मोंको रोकता है
ऐसा ही कथन पद्मनंदिपच्चीसीमें भी है
‘‘साम्यमेव’’ इत्यादि इसका तात्पर्य यह है, कि आदरसे समभावको ही धारण करना चाहिये,