Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-40 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୨୮୨ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୪୦
अथ यः समभावं करोति तस्यैव निश्चयेन सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि नान्यस्येति
दर्शयति
१६६) दंसणु णाणु चरित्तु तसु जो सम - भाउ करेइ
इयरहँ एक्कु वि अत्थि णवि जिणवरु एउ भणेइ ।।४०।।
दर्शनं ज्ञानं चारित्रं तस्य यः समभावं करोति
इतरस्य एकमपि अस्ति नैव जिनवरः एवं भणति ।।४०।।
दंसणु इत्यादि दंसणु णाणु चरित्तु सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रत्रयं तसु निश्चयनयेन तस्यैव
भवति कस्य जो सम-भाउ करेइ यः कर्ता समभावं करोति इयरहं इतरस्य समभावरहितस्य
ଵାଙ୍ମଯ (ଦ୍ଵାଦଶାଂଗ) ଆନୀ (ସମଭାଵନୀ) ପ୍ରକ୍ରିଯାମାତ୍ର ଜ ଛେ.] ୩୯.
ହଵେ, ଜେ ସମଭାଵ କରେ ଛେ ତେନେ ଜ ନିଶ୍ଚଯଥୀ ସମ୍ଯଗ୍ଦର୍ଶନ, ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ ଅନେ ସମ୍ଯକ୍ଚାରିତ୍ର
ହୋଯ ଛେ, ଅନ୍ଯନେ ନହି ଏମ ଦର୍ଶାଵେ ଛେ :
ଭାଵାର୍ଥ:ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ‘ନିଜ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମା ଜ ଉପାଦେଯ ଛେ’ ଏଵୀ ରୁଚିରୂପ
ସମ୍ଯଗ୍ଦର୍ଶନ ତେନେ ଜ ହୋଯ ଛେ, ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାନୀ ସଂଵିତ୍ତିଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ଵୀତରାଗ ପରମାନଂଦନା ମଧୁର-
ରସସ୍ଵାଦଵାଳୋ ଆ ଆତ୍ମା ଛେ ଅନେ ନିରଂତର ଆକୁଳତାନା ଉତ୍ପାଦକ ହୋଵାଥୀ କଟୁକ-
अन्य ग्रंथके विस्तारोंसे क्या, समस्त पंथ तथा सकल द्वादशांग इस समभावरूप सूत्रकी ही
टीका है
।।३९।।
आगे जो जीव समभावको करता है, उसीके निश्चयसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान,
सम्यक्चारित्र होता है, अन्यके नहीं, ऐसा दिखलाते हैं
गाथा४०
अन्वयार्थ :[दर्शनं ज्ञानं चारित्रं ] सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र [तस्य ] उसीके
निश्चयसे होते हैं, [यः ] जो यति [समभावं ] समभाव [करोति ] करता है, [इतरस्य ] दूसरे
समभाव रहित जीवके [एकं अपि ] तीन रत्नोंमेंसे एक भी [नैव अस्ति ] नहीं है, [एवं ] इस-
प्रकार [जिनवरः ] जिनेन्द्रदेव [भणति ] कहते हैं
भावार्थ :निश्चयनयसे निज शुद्धात्मा ही उपादेय है, ऐसी रुचिरूप सम्यग्दर्शन उस
समभावके धारकके होता है, और निज शुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न हुआ जो वीतराग परमानंद