Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
दुक्खमेव तहा ।।’’ इति गाथाकथितलक्षणं द्रष्टश्रुतानुभूतं यद्देहजनितसुखं तज्जगत्रये कालत्रयेऽपि
मनवचनकायैः कृतकारितानुमतैश्च त्यक्त्वा वीतरागनिर्विकल्पसमाधिबलेन पारमार्थिकानाकुलत्व-
लक्षणसुखपरिणते निजपरमात्मनि स्थित्वा च य एव देहाद्भिन्नं स्वशुद्धात्मानं जानाति स एव
देहस्योपरि रागद्वेषौ न करोति । अत्र य एव सर्वप्रकारेण देहममत्वं त्यक्त्वा देहसुखं नानुभवति
तस्यैवेदं व्याख्यानं शोभते नापरस्येति तात्पर्यार्थः ।।५१।।
अथ —
१७९) वित्ति-णिवित्तिहिँ परम-मुणि देसु वि करइ ण राउ ।
बंधहँ हेउ वियाणियउ एयहँ जेण सहाउ ।।५२।।
ଏ ପ୍ରମାଣେ ଆ ଗାଥାମାଂ କହେଲା ଲକ୍ଷଣଵାଳୁଂ, ଦେଖେଲୁଂ, ସାଂଭଳେଲୁଂ ଅନେ ଅନୁଭଵେଲୁଂ ଜେ ଦେହଜନିତ ସୁଖ
ଛେ ତେନେ ତ୍ରଣ ଲୋକମାଂ ତ୍ରଣ କାଳମାଂ ମନ-ଵଚନ-କାଯଥୀ କୃତ, କାରିତ, ଅନୁମୋଦନଥୀ ଛୋଡୀନେ ଅନେ
ଵୀତରାଗନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସମାଧିନା ବଳଥୀ ଅନାକୁଳତା ଜେନୁଂ ଲକ୍ଷଣ ଛେ ଏଵା ପାରମାର୍ଥିକ ସୁଖରୂପେ ପରିଣତ
ନିଜ ପରମାତ୍ମାମାଂ ସ୍ଥିତ ଥଈନେ ଜେ ମହାମୁନି ଦେହଥୀ ଭିନ୍ନ ସ୍ଵଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାନେ ଜାଣେ ଛେ ତେ ଜ ଦେହନୀ
ଉପର ରାଗ-ଦ୍ଵେଷ କରତୋ ନଥୀ.
ଅହୀଂ, ସର୍ଵ ପ୍ରକାରେ ଦେହନୁଂ ମମତ୍ଵ ଛୋଡୀନେ ଦେହସୁଖନେ ଜେ ଅନୁଭଵତୋ ନଥୀ ତେନେ ଆ ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନ
ଶୋଭେ ଛେ ପଣ ବୀଜାନେ ନହି. (ପଣ ଜେ ଦେହବୁଦ୍ଧିଵାଳା ଛେ ତେମନେ ଆ ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନ ଶୋଭତୁଂ ନଥୀ), ଏଵୋ
ତାତ୍ପର୍ଯାର୍ଥ ଛେ. ୫୧.
ଵଳୀ (ହଵେ, ପ୍ରଵୃତ୍ତି ଅନେ ନିଵୃତ୍ତିମାଂ ପଣ ମହାମୁନି ରାଗ-ଦ୍ଵେଷ କରତୋ ନଥୀ. ଏମ କହେ ଛେ) : —
୩୦୨ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୫୧
होता है, वह सुख दुःखरूप ही है, क्योंकि वह सुख परवस्तु है, निजवस्तु नहीं है, बाधा सहित
है, निराबाध नहीं है, नाशके लिए हुए है, जिसका नाश हो जाता है, बन्धका कारण है, और
विषम है । इसलिए इन्द्रियसुख दुःखरूप ही है, ऐसा इस गाथामें जिसका लक्षण कहा गया
है, ऐसे देहजनित सुखको मन, वचन, काय, कृत, कारित अनुमोदनासे छोड़े ।
वीतरागनिर्विकल्पसमाधिके बलसे आकुलता रहित परमसुख निज परमात्मामें स्थित होकर जो
महामुनि देहसे भिन्न अपने शुद्धात्माको जानता है, वही देहके ऊ पर राग-द्वेष नहीं करता । जो
सब तरह देहसे निर्ममत्व होकर देहसे सुखको नहीं अनुभवता, उसीके लिए यह व्याख्यान शोभा
देता है, और देहबुद्धिवालोंको नहीं शोभता, ऐसा अभिप्राय जानना ।।५१।।
आगे प्रवृत्ति और निवृत्तिमें भी महामुनि राग-द्वेष नहीं करता, ऐसा कहते हैं —