Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-71 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୩୩୮ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୭୧
१९८) सुह-परिणामेँ धम्मु पर असुहेँ होइ अहम्मु
दोहिँ वि एहिँ विवज्जियउ सुद्धु ण बंधइ कम्मु ।।७१।।
शुभपरिणामेन धर्मः परं अशुभेन भवति अधर्मः
द्वाभ्यामपि एताभ्यां विवर्जितः शुद्धो न बध्नाति कर्म ।।७१।।
सुह इत्यादि पदखण्डनारूपेण व्याख्यानं क्रियते सुह-परिणामें धम्मु पर शुभपरिणामेन
धर्मः परिणामेन धर्मः पुण्यं भवति मुख्यवृत्त्या असुहें होइ अहम्मु अशुभपरिणामेन भवत्यधर्मः
पापम् दोहिं वि एहिं विवज्जियउ द्वाभ्यां एताभ्यां शुभाशुभपरिणामाभ्यां विवर्जितः कोऽसौ सुद्धु
शुद्धो मिथ्यात्वरागादिरहितपरिणामस्तत्परिणतपुरुषो वा किं करोति ण बंधइ न बध्नाति
किम् कम्मु ज्ञानावरणादिकर्मेति तद्यथा कृष्णोपाधिपीतोपाधिस्फ टिकवदयमात्मा क्रमेण
शुभाशुभ-शुद्धोपयोगरूपेण परिणामत्रयं परिणमति तेन तु मिथ्यात्वविषयकषायाद्यवलम्बनेन पापं
ଭାଵାର୍ଥ:ଜେଵୀ ରୀତେ ସ୍ଫଟିକମଣି କାଳା ରଂଗନୀ ଉପାଧିନା ସଦ୍ଭାଵମାଂ କାଳୋ, ପୀଳା ରଂଗନୀ
ଉପାଧିନା ସଦ୍ଭାଵମାଂ ପୀଳୋ (ଅନେ ଉପାଧି ରହିତ ହୋତାଂ ଶୁଦ୍ଧ ଉଜ୍ଜ୍ଵଳ) ଜଣାଯ ଛେ ତେଵୀ ରୀତେ ଆ
ଆତ୍ମା କ୍ରମଥୀ ଶୁଭ, ଅଶୁଭ ଅନେ ଶୁଦ୍ଧ ଉପଯୋଗରୂପ ତ୍ରଣ ପରିଣାମରୂପେ ପରିଣମେ ଛେ. ମିଥ୍ଯାତ୍ଵ,
ଵିଷଯ, କଷାଯାଦିନା ଅଵଲଂବନଥୀ ତୋ ଆତ୍ମା ପାପ ବାଂଧେ ଛେ. ଅର୍ହଂତ, ସିଦ୍ଧ, ଆଚାର୍ଯ, ଉପାଧ୍ଯାଯ
गाथा७१
अन्वयार्थ :[शुभपरिणामेन ] दान पूजादि शुभ परिणामोंसे [धर्मः ] पुण्यरूप
व्यवहारधर्म [परं ] मुख्यतासे [भवति ] होता है, [अशुभेन ] विषय कषायादि अशुभ परिणामोंसे
[अधर्मः ] पाप होता है, [अपि ] और [एताभ्यां ] इन [द्वाभ्याम् ] दोनोंसे [विवर्जितः ] रहित
[शुद्धः ] मिथ्यात्व रागादि रहित शुद्ध परिणाम अथवा परिणामधारी पुरुष [कर्म ] ज्ञानावरणादि
कर्मको [न ] नहीं [बध्नाति ] बाँधता
भावार्थ :जैसे स्फ टिकमणि शुद्ध उज्ज्वल है, उसके जो काला डंक लगावें, तो
काला मालूम होता है, और पीला डंक लगावें तो पीला भासता है, और यदि कुछ भी
न लगावें, तो शुद्ध स्फ टिक ही है, उसी तरह यह आत्मा क्रमसे अशुभ, शुभ, शुद्ध इन
परिणामोंसे परिणत होता है
उनमेंसे मिथ्यात्व और विषय कषायादि अशुभके अवलम्बन
(सहायता) से तो पापको ही बाँधता है, उसके फ लसे नरक निगोदादिके दुःखोंको भोगता
है और अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु इन पाँच परमेष्ठियोंके गुणस्मरण और