Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୭୧ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୩୩୯
बध्नाति । अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसाधुगुणस्मरणदानपूजादिना संसारस्थितिच्छेदपूर्वकं
तीर्थंकरनामकर्मादि-विशिष्टगुणपुण्यमनीहितवृत्त्या बध्नाति । शुद्धात्मावलम्बनेन शुद्धोपयोगेन तु
केवलज्ञानाद्य-नन्तगुणरूपं मोक्षं च लभते इति । अत्रोपयोगत्रयमध्ये मुख्यवृत्त्या शुद्धोपयोग
एवोपादेय इत्याभिप्रायः ।।७१।। एवमेकचत्वारिंशत्सूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये सूत्रपञ्चकेन शुद्धोपयोग-
व्याख्यानमुख्यत्वेन प्रथमान्तरस्थलं गतम् ।।
अत ऊर्ध्वं तस्मिन्नेव महास्थलमध्ये पञ्चदशसूत्रपर्यन्तं वीतरागस्वसंवेदन ज्ञानीमुख्यत्वेन
व्याख्यानं क्रियते । तद्यथा —
१९९) दाणिं लब्भइ भोउ पर इंदत्तणु वि तवेण ।
जम्मण-मरण-विवज्जियउ पउ लब्भइ णाणेण ।।७२।।
ଅନେ ସାଧୁନା ଗୁଣସ୍ମରଣ ଅନେ ଦାନପୂଜାଦିଥୀ ସଂସାରନୀ ସ୍ଥିତିନା ଛେଦପୂର୍ଵକ ତୀର୍ଥଂକରନାମକର୍ମାଦିଥୀ
ମାଂଡୀନେ ଵିଶିଷ୍ଟ ଗୁଣରୂପ ପୁଣ୍ଯପ୍ରକୃତିଓନେ ଅନୀହିତଵୃତ୍ତିଥୀ ବାଂଧେ ଛେ ଅନେ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାନା
ଅଵଲଂବନରୂପ ଶୁଦ୍ଧ-ଉପଯୋଗଥୀ ତୋ କେଵଳଜ୍ଞାନାଦି ଅନଂତଗୁଣରୂପ ମୋକ୍ଷନେ ପାମେ ଛେ.
ଅହୀଂ, ତ୍ରଣ ପ୍ରକାରନା ଉପଯୋଗମାଂଥୀ ମୁଖ୍ଯପଣେ ଶୁଦ୍ଧ-ଉପଯୋଗ ଜ ଉପାଦେଯ ଛେ, ଏଵୋ ଅଭିପ୍ରାଯ
ଛେ. ୭୧.
ଏ ପ୍ରମାଣେ ଏକତାଲୀସ ସୂତ୍ରୋନା ମହାସ୍ଥଳମାଂ ପାଂଚ ଗାଥାସୂତ୍ରଥୀ ଶୁଦ୍ଧୋପଯୋଗନା ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନନୀ
ମୁଖ୍ଯତାଥୀ ପ୍ରଥମ ଅନ୍ତରସ୍ଥଳ ସମାପ୍ତ ଥଯୁଂ.
ଆନୀ ପଛୀ ତେ ଜ ମହାସ୍ଥଳମାଂ ପଂଦର ସୂତ୍ର ସୁଧୀ ଵୀତରାଗସ୍ଵସଂଵେଦନରୂପ ଜ୍ଞାନନୀ ମୁଖ୍ଯତାଥୀ
ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନ କରେ ଛେ, ତେ ଆ ପ୍ରମାଣେ : —
दानपूजादि शुभ क्रियाओंसे संसारकी स्थितिका छेदनेवाला जो तीर्थंकरनामकर्म उसको आदि
ले विशिष्ट गुणरूप पुण्यप्रकृतियोंको अवाँछीक वृत्तिसे बाँधता है । तथा केवल शुद्धात्माके
अवलम्बनरूप शुद्धोपयोगसे उसी भवमें केवलज्ञानादि अनंतगुणरूप मोक्षको पाता है । इन
तीन प्रकारके उपयोगोंमेंसे सर्वथा उपादेय तो शुद्धोपयोग ही है, अन्य नहीं है । और शुभ,
अशुभ इन दोनोंमेंसे अशुभ तो सब प्रकारसे निषिद्ध है, नरक निगोदका कारण है, किसी
तरह उपादेय नहीं है – हेय है, तथा शुभोपयोग प्रथम अवस्थामें उपादेय है, और परम
अवस्थामें उपादेय नहीं है, हेय है ।।७१।।
इसप्रकार इकतालीस दोहोंके महास्थलमें पाँच दोहोंमें शुद्धोपयोगका व्याख्यान किया ।
आगे पन्द्रह दोहोंमें वीतरागस्वसंवेदनज्ञानकी मुख्यतासे व्याख्यान करते हैं —