Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୩୪୦ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୭୨
दानेन लभ्यते भोगः परं इन्द्रत्वमपि तपसा
जन्ममरणविवर्जितं पदं लभ्यते ज्ञानेन ।।७२।।
दाणिं इत्यादि दाणिं लब्भइ भोउ पर दानेन लभ्यते पञ्चेन्द्रियभोगः परं नियमेन
इंदत्तणु वि तवेण इन्द्रत्वमपि तपसा लभ्यते जम्मण-मरण-विवज्जियउ जन्ममरणविवर्जितं पउ
पदं स्थानं लब्भइ लभ्यते प्राप्यते केन णाणेण वीतरागस्वसंवेदनज्ञानेनेति तथाहि
आहाराभयभैषज्यशास्त्रदानेन सम्यक्त्वरहितेन भोगो लभ्यते सम्यक्त्वसहितेन तु यद्यपि
परंपरया निर्वाणं लभ्यते तथापि विविधाभ्युदयरूपः पञ्चेन्द्रियभोग एव सम्यक्त्वसहितेन
तपसा तु यद्यपि निर्वाणं लभ्यते तथापि देवेन्द्रचक्रवर्त्यादिविभूतिपूर्वकेणैव वीतरागस्वसंवेदन-
सम्यग्ज्ञानेन सविकल्पेन यद्यपि देवेन्द्रचक्रवर्त्यादिविभूतिविशेषो भवति तथापि निर्विकल्पेन मोक्ष
ଭାଵାର୍ଥ:ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵରହିତନା ଆହାରଦାନ, ଅଭଯଦାନ ଔଷଧଦାନ ଅନେ ଶାସ୍ତ୍ରଦାନଥୀ
ଭୋଗ ମଳେ ଛେ. ଅନେ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵସହିତନା ଏ ଚାର ଦାନଥୀଜୋକେ ପରଂପରାଏ ନିର୍ଵାଣ ମଳେ ଛେ ତୋପଣ
ଵିଵିଧ ଅଭ୍ଯୁଦଯରୂପ ପଂଚେନ୍ଦ୍ରିଯନା ଭୋଗ ଜ ମଳେ ଛେ.
ଅନେ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ସହିତନା ତପଥୀ ଜୋକେ ନିର୍ଵାଣ ମଳେ ଛେ ତୋପଣ ଦେଵେନ୍ଦ୍ର, ଚକ୍ରଵର୍ତୀ ଆଦି
ଵିଭୂତିପୂର୍ଵକ ଜ ମୋକ୍ଷ ମଳେ ଛେ.
ଵୀତରାଗ ସ୍ଵସଂଵେଦନସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନଥୀ ଜୋକେ ସଵିକଲ୍ପନେ କାରଣେ ଦେଵେନ୍ଦ୍ର, ଚକ୍ରଵର୍ତୀ ଆଦି
ଵିଭୂତିଵିଶେଷନୀ ପ୍ରାପ୍ତି ଥାଯ ଛେ ତୋପଣ ନିର୍ଵିକଲ୍ପନେ କାରଣେ ମୋକ୍ଷନୀ ଜ ପ୍ରାପ୍ତି ଥାଯ ଛେ.
गाथा७२
अन्वयार्थ :[दानेन ] दानसे [परं ] नियम करके [भोगः ] पाँच इंद्रियोंके भोग
[लभ्यते ] प्राप्त होते हैं, [अपि ] और [तपसा ] तपसे [इंद्रत्वम् ] इंद्रपद मिलता है, तथा
[ज्ञानेन ] वीतरागस्वसंवेदनज्ञानसे [जन्ममरणविवर्जितं ] जन्म-जरा-मरणसे रहित [पदं ] जो
मोक्ष
पद वह [लभ्यते ] मिलता है
भावार्थ :आहार, अभय, औषध और शास्त्र इन चार तरहके दानोंको यदि सम्यक्त्व
रहित करे, तो भोगभूमिके सुख पाता है, तथा सम्यक्त्व सहित दान करे, तो परम्पराय मोक्ष
पाता है
यद्यपि प्रथम अवस्थामें देवेन्द्र चक्रवर्ती आदिकी विभूति भी पाता है, तो भी
निर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानकर मोक्ष ही है यहाँ प्रभाकरभट्टने प्रश्न किया, कि हे भगवन्, जो
ज्ञानमात्रसे ही मोक्ष होता है, तो सांख्यादिक भी ऐसा ही कहते हैं, कि ज्ञानसे ही मोक्ष है, उनको
क्यों दूषण देते हो ? तब श्रीगुरुने कहा
इस जिनशासनमें वीतरागनिर्विकल्प स्वसंवेदन