Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୮୪ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୩୫୭
अथ बोधार्थं शास्त्रं पठन्नपि यस्य विशुद्धात्मप्रतीतिलक्षणो बोधो नास्ति स मूढो भवतीति
प्रतिपादयति —
२११) बोह-णिमित्तेँ सत्थु किल लोइ पढिज्जइ इत्थु ।
तेण वि बोहु ण जासु वरु सो किं मूढु ण तत्थु ।।८४।।
बोधनिमित्तेन शास्त्रं किल लोके पठयते अत्र ।
तेनापि बोधो न यस्य वरः स किं मूढो न तथ्यम् ।।८४।।
बोह इत्यादि । बोधनिमित्तेन किल शास्त्रं लोके पठयते अत्र तेनैव कारणेन
बोधो न यस्य कथंभूतः । वरो विशिष्टः । स किं मूढो न भवति किंतु भवत्येव
तथ्यमिति । तद्यथा । अत्र यद्यपि लोकव्यवहारेण कविगमकवादित्ववाग्मित्वादिलक्षणशास्त्र-
जनितो बोधो भण्यते तथापि निश्चयेन परमात्मप्रकाशकाध्यात्मशास्त्रोत्पन्नो वीतरागस्व-
ହଵେ, ବୋଧାର୍ଥେ....(ଜ୍ଞାନ ମାଟେ) ଶାସ୍ତ୍ର ଭଣୀନେ ପଣ ଜେନେ ଵିଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାନୀ ପ୍ରତୀତିସ୍ଵରୂପ
ବୋଧ ଥତୋ ନଥୀ ତେ ମୂଢ ଛେ, ଏମ କହେ ଛେ : —
ଭାଵାର୍ଥ: — ଅହୀଂ ଜୋ କେ ଲୋକଵ୍ଯଵହାରଥୀ (ନଵୀନ କଵିତାନା କରନାର) କଵି, (ପ୍ରାଚୀନ
କାଵ୍ଯୋନୀ ଟୀକାନା କରନାର) ଗମକ, (ଜେନେ ଵାଦମାଂ କୋଈ ନ ଜୀତୀ ଶକେ ଏଵୁଂ) ଵାଦିତ୍ଵ, ଅନେ
(ଶ୍ରୋତାଓନା ମନନେ ରଂଜକ କରନାର ଏଵା ଶାସ୍ତ୍ରଵକ୍ତା ହୋଵା ରୂପ) ଵାଗ୍ମିତ୍ଵ, ଇତ୍ଯାଦି ଲକ୍ଷଣଵାଳୁଂ
ଶାସ୍ତ୍ରଜନିତ ଜ୍ଞାନ କହେଵାଯ ଛେ ତୋପଣ ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ପରମାତ୍ମସ୍ଵରୂପନା ପ୍ରକାଶକ ଅଧ୍ଯାତ୍ମଶାସ୍ତ୍ରଥୀ
आगे ज्ञानके लिए शास्त्रको पढ़ते हुए भी जिसके आत्म - ज्ञान नहीं, वह मूर्ख है, ऐसा
कथन करते हैं —
गाथा – ८४
अन्वयार्थ : — [अत्र लोके ] इस लोकमें [किल ] नियमसे [बोधनिमित्तेन ] ज्ञानके
निमित्त [शास्त्रं ] शास्त्र [पठ्यते ] पढ़े जाते हैं, [तेनापि ] परंतु शास्त्रके पढ़नेसे भी [यस्य ]
जिसको [वरः बोधः न ] उत्तम ज्ञान नहीं हुआ, [स ] वह [किं ] क्या [मूढः न ] मूर्ख नहीं
है ? [तथ्यम् ] मूर्ख ही है, इसमें संदेह नहीं ।
भावार्थ : — इस लोकमें यद्यपि लोक व्यवहारसे नवीन कविताका कर्ता कवि,
प्राचीन काव्योंकी टीकाके कर्त्ताको गमक, जिससे वादमें कोई न जीत सके ऐसा वादित्व,
और श्रोताओं के मनको अनुरागी करनेवाला शास्त्रका वक्ता होनेरूप वाग्मित्व, इत्यादि
लक्षणोंवाला शास्त्रजनित ज्ञान होता है, तो भी निश्चयनयसे वीतरागस्वसंवेदनरूप ही ज्ञानकी