Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-163 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୪୮୨ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୬୩
मोहकारणं न भवतीति न च परकल्पितवायुः किंच कुम्भकपूरकरेचकादिसंज्ञा वायुधारणा
क्षणमात्रं भवत्येवात्र किंतु अभ्यासवशेन घटिकाप्रहरदिवसादिष्वपि भवति तस्य वायुधारणस्य च
कार्यं देहारोगत्वलघुत्वादिकं न च मुक्ति रिति
यदि मुक्ति रपि भवति तर्हि वायुधारणाकार-
काणामिदानीन्तनपुरुषाणां मोक्षो किं न भवतीति भावार्थः ।।१६२।।
अथ
२९४) मोहु विलिज्जइ मणु मरइ तुट्टइ सासु-णिसासु
केवल-णाणु वि परिणमइ अंबरि जाहँ णिवासु ।।१६३।।
मोहो विलीयते मनो म्रियते त्रुटयति श्वासोच्छ्वासः
केवलज्ञानमपि परिणमति अम्बरे येषां निवासः ।।१६३।।
ଅନେ ତେ ଵାଯୁଧାରଣାନୁଂ କାର୍ଯ ଶରୀରନୀ ଆରୋଗ୍ଯତା ଅନେ ଶରୀରନା ହଲକାପଣୁଂ ଆଦି ଛେ ପଣ ତେନୁଂ
କାର୍ଯ ମୁକ୍ତି ନଥୀ. ଜୋ ଵାଯୁଧାରଣାନୁଂ କାର୍ଯ ମୁକ୍ତି ପଣ ହୋଯ (ଜୋ ଵାଯୁଧାରଣାଥୀ ମୋକ୍ଷ ଥତୋ ହୋଯ)
ତୋ ଵାଯୁଧାରଣା କରନାର ଅତ୍ଯାରନା ପୁରୁଷୋନୋ ମୋକ୍ଷ କେମ ଥତୋ ନଥୀ, ଏଵୋ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୧୬୨.
ହଵେ, ଫରୀ ପରମସମାଧିନୁଂ କଥନ କରେ ଛେ :
दर्शनस्वरूप है, सो शुद्धोपयोगी तो स्वरूपमें अतिलीन हैं, और शुभोपयोगी कुछ एक मनको
चपलतासे आनंदघनमें अडोल अवस्थाको नहीं पाते, तब तक मनके वश करनेके लिए
श्रीपंचपरमेष्ठीका ध्यान स्मरण करते हैं, ओंकारादि मंत्रोंका ध्यान करते हैं और प्राणायामका
अभ्यास कर मनको रोकके चिद्रूपमें लगाते हैं, जब वह लग गया, तब मन और पवन सब स्थिर
हो जाते हैं
शुद्धोपयोगियोंकी दृष्टि एक शुद्धोपयोगपर हो, पातंजलिमतकी तरह थोथी वायुधारणा
नहीं है जो वायुधारणासे ही शक्ति होवे, तो वायुधारणा करनेवालोंको उस दुःषमकालमें मोक्ष
क्यों न होवे ? कभी नहीं होता मोक्ष तो केवल स्वभावमयी है ।।१६२।।
आगे फि र परमसमाधिका कथन करते हैं
गाथा१६३
अन्वयार्थ :[येषां ] जिन मुनिश्वरोंका [अंबरे ] परमसमाधिमें [निवासः ] निवास है,
उनका [मोहः ] मोह [विलीयते ] नाशको प्राप्त हो जाता है, [मनः ] मन [म्रियते ] मर जाता
है, [श्वासोच्छ्वासः ] श्वासोच्छ्वास [त्रुटयति ] रुक जाता है, [अपि ] और [केवलज्ञानम् ]
केवलज्ञान [परिणमति ] उत्पन्न होता है