Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୬୩ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୪୮୩
मोहु विलिज्जइ इत्यादि मोहु मोहो ममत्वादिविकल्पजालं विलिज्जइ विलयं गच्छति
मणु मरइ इहलोकपरलोकाशाप्रभृतिविकल्पजालरूपं मनो म्रियते तुट्टइ नश्यति कोऽसौ
सासु-णिसासु अनीहितवृत्त्या नासिकाद्वारं विहाय क्षणमात्रं तालुरन्ध्रेण गच्छति पुनरप्यन्तरं
नासिकया कृत्वा निर्गच्छति पुनरपि रन्ध्रेणेत्युच्छ्वासनिःश्वासलक्षणो वायुः
पुनरपि किं
भवति केवल-णाणु वि परिणमइ केवलज्ञानमपि परिणमति समुत्पद्यते येषां किम् अंबरि
जाहं णिवासु रागद्वेषमोहरूपविकल्पजालशून्यं अम्बरे अम्बरशब्दवाच्ये शुद्धात्मसम्यक्श्रद्धान-
ज्ञानानुचरणरूपे निर्विकल्पत्रिगुप्तिगुप्तपरमसमाधौ येषां निवास इति
अयमत्र भावार्थः
अम्बरशब्देन शुद्धाकाशं न ग्राह्यं किंतु विषयकषायविकल्पशून्यः परमसमाधिर्ग्राह्यः, वायुशब्देन
ଭାଵାର୍ଥ :ରାଗ-ଦ୍ଵେଷ-ମୋହରୂପ ଵିକଲ୍ପଜାଳଥୀ ଶୂନ୍ଯ (ଖାଲୀ) ଅଂବରମାଂ ‘ଅଂବର’
ଶବ୍ଦଥୀ ଵାଚ୍ଯ ଏଵୀ, ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାନାଂ ସମ୍ଯକ୍ଶ୍ରଦ୍ଧାନ, ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ ଅନେ ସମ୍ଯଗ୍ ଆଚରଣରୂପ
ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ତ୍ରଣ ଗୁପ୍ତିଥୀ ଗୁପ୍ତ ପରମସମାଧିମାଂ ଜେନୋ ନିଵାସ ଛେ ତେନା ମୋହ-ମମତ୍ଵାଦି ଵିକଲ୍ପଜାଳ
ନାଶ ପାମେ ଛେ. ଆଲୋକ, ପରଲୋକନୀ ଆଶାଥୀ ମାଂଡୀନେ ଵିକଲ୍ପଜାଳରୂପ ମନ ମରୀ ଜାଯ ଛେ,
ଉଚ୍ଛ୍ଵାସ-ନିଶ୍ଵାସଲକ୍ଷଣ ଵାଯୁ ଅନୀହିତଵୃତ୍ତିଥୀ ନାସିକା ଦ୍ଵାରନେ ଛୋଡୀନେ କ୍ଷଣଵାର ତାଲୁରଂଧ୍ରମାଂଥୀ
ନୀକଳେ ଛେ, ଵଳୀ ପଛୀ ନାସିକା ଦ୍ଵାରା ନୀକଳେ ଛେ ଵଳୀ ପାଛୋ ବ୍ରହ୍ମରଂଧ୍ରଥୀ ନୀକଳେ ଛେ. ଵଳୀ
କେଵଳଜ୍ଞାନ ପଣ ପରିଣମେ ଛେ-ଉତ୍ପନ୍ନ ଥାଯ ଛେ.
ଅହୀଂ, ଆ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ କେ ‘ଅଂବର’ ଶବ୍ଦଥୀ ଶୁଦ୍ଧ ଆକାଶ ନ ସମଜଵୋ ପଣ
ଵିଷଯକଷାଯନା ଵିକଲ୍ପୋଥୀ ଶୂନ୍ଯ (ଖାଲୀ) ପରମ ସମାଧି ସମଜଵୀ. (ଅଂବର ଶବ୍ଦନୋ ଅର୍ଥ ଶୁଦ୍ଧ
ଆକାଶ ନ ଲେଵୋ ‘ଅଂବର’ ଶବ୍ଦନୋ ଅର୍ଥ ପରମ ସମାଧି ଲେଵୋ), ଅନେ ‘ଵାଯୁ’ ଶବ୍ଦଥୀ କୁଂଭକ, ରେଚକ,
ପୂରକ ଆଦିରୂପ ଵାଯୁନିରୋଧ ନ ସମଜଵୋ ପଣ ସ୍ଵଯଂ ଅନୀହିତଵୃତ୍ତିଥୀ ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସମାଧିନା ବଳଥୀ
भावार्थ :दर्शनमोह और चारित्रमोह आदि कल्पना-जाल सब विलय हो जाते हैं,
इस लोक परलोक आदिकी वाँछा आदि विकल्परूप मन स्थिर हो जाता है, और
श्वासोच्छ्वासरूप वायु रुक जाती है, श्वासोच्छ्वास अवाँछीकपनेसे नासिकाके द्वारको
छोड़कर तालुछिद्रमें होकर निकलते हैं, तथा कुछ देरके बाद नासिकासे निकलते हैं
इस-
प्रकार श्वासोच्छ्वासरूप पवन वश हो जाता है चाहे जिस द्वारसे निकालो केवलज्ञान भी
शीघ्र ही उन ध्यानी मुनियोंके उत्पन्न होता है, कि जिन मुनियोंका राग-द्वेष-मोहरूप
विकल्पजालसे रहित शुद्धात्माका सम्यक् श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप निर्विकल्प त्रिगुप्तिमयी
परमसमाधिमें निवास है
यहाँ अम्बर नाम आकाशका अर्थ नहीं समझना, किन्तु समस्त
विषय-कषायरूप विकल्प-जालोंसे शून्य परमसमाधि लेना और यहाँ वायु शब्दसे कुंभक
पूरक रेचकादिरूप वाँछापूर्वक वायुनिरोध न लेना, किन्तु स्वयमेव अवाँछिक वृत्ति पर