Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୦୮ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୮୩
जं यत् भुंजेवउ होइ भोक्त व्यं भवति । किं कृत्वा । उदयहं आणिवि
विशिष्टात्मभावनाबलेनोदयमानीय । किम् । कम्मु चिरसंचितं । कर्म । केन । मइं मया तं तत्
पूर्वोक्तं कर्म सह आविउ दुर्धरपरीषहोपसर्गवशेन स्वयमुदयमागतं सत् खविउ मइं
निजपरमात्मतत्त्वभावनोत्पन्नवीतरागसहजानन्दैकसुखरसास्वादद्रवीभूतेन परिणतेन मनसा क्षपितं
मया सो स परं नियमेन लाहु जि लाभ एव कोइ कश्चिदपूर्व इति । अत्र केचन महापुरुषा
दुर्धरानुष्ठानं कृत्वा वीतरागनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वा च कर्मोदयमानीय तमनुभवन्ति, अस्माकं
पुनः स्वयमेवोदयागतमिति मत्वा संतोषः कर्तव्य इति तात्पर्यम् ।।१८३।।
ଭାଵାର୍ଥ : — ଜେ ଚିରସଂଚିତ କର୍ମନେ ଵିଶିଷ୍ଟ ଆତ୍ମଭାଵନାନା ବଳଥୀ ଉଦଯମାଂ ଲାଵୀନେ ମାରେ
ଭୋଗଵୀ ଲେଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ ତେ ପୂର୍ଵୋକ୍ତ କର୍ମ ଦୁର୍ଧର ପରିଷହ, ଉପସର୍ଗନା ଵଶଥୀ ସ୍ଵଯଂ ଉଦଯମାଂ ଆଵ୍ଯୁଂ
ଅନେ ନିଜ ପରମାତ୍ମତତ୍ତ୍ଵନୀ ଭାଵନାଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ଏକ (କେଵଳ) ଵୀତରାଗ ସହଜାନଂଦମଯ
ସୁଖରସାସ୍ଵାଦରୂପେ ଦ୍ରଵୀଭୂତ – ପରିଣମେଲ – ମନ ଵଡେ ମେଂ ତେନେ କ୍ଷଯ କର୍ଯୁଂ ତେ ନିଯମଥୀ କୋଈ ଅପୂର୍ଵ ଲାଭ
ଜ ଛେ.
ଅହୀଂ, କୋଈ ମହାପୁରୁଷୋ ଦୁର୍ଧର ଅନୁଷ୍ଠାନ କରୀନେ ଅନେ ଵୀତରାଗ ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସମାଧିମାଂ ସ୍ଥିତ
ଥଈନେ କର୍ମନେ ଉଦଯମାଂ ଲାଵୀନେ ତେନେ ଅନୁଭଵେ ଛେ, ତ୍ଯାରେ ଅମନେ ତୋ କର୍ମ ସ୍ଵଯମେଵ ଉଦଯମାଂ ଆଵ୍ଯାଂ
ଏମ ଜାଣୀନେ ସଂତୋଷ କରଵୋ, ଏଵୁଂ ତାତ୍ପର୍ଯ ଛେ. ୧୮୩.
लाकर [भोक्तव्यं भवति ] भोगने चाहता था, [तत् ] वह कर्म [स्वयम् आगतं ] आप ही आ
गया, [मया क्षपितं ] इससे मैं शांत चित्तसे फ ल सहनकर क्षय करूँ, [स कश्चित् ] यह कोई
[परं लाभः ] महान् ही लाभ हुआ ।
भावार्थ : — जो महामुनि मुक्तिके अधिकारी हैं, उदयमें वे नहीं आये हुए कर्मोंको परम
आत्म – ज्ञानकी भावनाके बलसे उदयमें लाकर उसका फ ल भोगकर शीघ्र निर्जरा कर देते हैं ।
और जो वे पूर्वकर्म बिना उपायके सहज ही बाईस परीषह तथा उपसर्गके वशसे उदयमें आये
हों, तो विषाद न करना बहुत लाभ समझना । मनमें यह मानना कि हम तो उदीरणासे इन
कर्मोंको उदयमें लाकर क्षय करते, परंतु ये सहज ही उदयमें आये, वह तो बड़ा ही लाभ है ।
जैसे कोई बड़ा व्यापारी अपने ऊ परका कर्ज लोगोंको बुला बुलाके देता है, यदि कोई बिना
बुलाये सहज ही लेने आया हो, तो बड़ा ही लाभ है । उसी तरह कोई महापुरुष महान दुर्धर
तप करके कर्मोंको उदयमें लाके क्षय करते हैं, लेकिन वे कर्म अपने स्वयमेव उदयमें आये
हैं, तो इनके समान दूसरा क्या है, ऐसा संतोष धारणकर ज्ञानीजन उदय आये हुए कर्मोंको भोगते
हैं, परंतु राग-द्वेष नहीं करते ।।१८३।।