Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-184 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୮୪ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୫୦୯
अथ इदानीं परुषवचनं सोढुं न याति तदा निर्विकल्पात्मतत्त्वभावना कर्तव्येति
प्रतिपादयति
३१५) णिट्ठुर-वयणु सुणेवि जिय जइ मणि सहण ण जाइ
तो लहु भावहि बंभु परु जिं मणु झत्ति विलाइ ।।१८४।।
निष्ठुरवचनं श्रुत्वा जीव यदि मनसि सोढुं न याति
ततो लघु भावय ब्रह्म परं येन मनो झटिति विलीयते ।।१८४।।
जइ यदि चेत् सहण ण जाइ सोढुं न याति क्व मणि मनसि जिय हे मूढ जीव
किं कृत्वा सुणेवि श्रुत्वा किम् णिट्ठुरवयणु निष्ठुरं हृदयकर्णशूलवचनं तो तद्वचनश्रवणानन्तरं
लहु शीघ्रं भावहि वीतरागपरमानन्दैकलक्षणनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वा भावय कम् बंभ
ब्रह्मशब्दवाच्यनिजदेहस्थपरमात्मानम् कथंभूतम् परु परमानन्तज्ञानादि गुणाधारत्वात् परमुत्कृष्टं
जिं येन परमात्मध्यानेन किं भवति मणु झत्ति विलाइ वीतरागनिर्विकल्पसमाधिसमुत्पन्न-
ହଵେ, ଜୋ ଆ କଠୋର ଵଚନ ସହନ ନ ଥାଯ ତୋ (ପୋତାନୋ କଷାଯଭାଵ ରୋକଵା ମାଟେ) ନିର୍ଵିକଲ୍ପ
ଆତ୍ମତତ୍ତ୍ଵନୀ ଭାଵନା କରଵୀ, ଏମ କହେ ଛେ :
ଭାଵାର୍ଥ :ହେ ମୂଢ ଜୀଵ! ଜୋ ନିଷ୍ଠୁର, ହୃଦଯ ଅନେ କାନମାଂ ଶୂଳ ଜେଵୁଂ ଖୂଂଚନାରୁଂ
ଵଚନ ସାଂଭଳୀନେ ମନମାଂ ତାରାଥୀ ସହନ ନ ଥଈ ଶକେ ତୋ ତେ ଵଚନ ସାଂଭଳ୍ଯା ପଛୀ ଶୀଘ୍ର
आगे यह कहते हैं कि जो कोई कर्कश (कठोर) वचन कहे, और यह न सह
सकता हो तो अपने कषायभाव रोकनेके लिये निर्विकल्प आत्मतत्त्वकी भावना करनी
चाहिए
गाथा१८४
अन्वयार्थ :[जीव ] हे जीव, [निष्ठुरवचनं श्रुत्वा ] जो कोई अविवेकी किसीको
कठोर वचन कहे, उसको सुनकर [यदि ] जो [न सोढुं याति ] न सह सके, [ततः ] तो
कषाय दूर करनेके लिये [परं ब्रह्म ] परमानंदस्वरूप इस देहमें विराजमान परमब्रह्मका
[मनसि ] मनमें [लघु ] शीघ्र [भावय ] ध्यान करो
जो ब्रह्म अनंत ज्ञानादि गुणोंका आधार
है, सर्वोत्कृष्ट है, [येन ] जिसके ध्यान करनेसे [मनः ] मनका विकार [झटिति ] शीघ्र ही
[विलीयते ] विलीन हो जाता है
।।१८४।।