Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୧୦ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୮୫
परमानन्दैकरूपसुखामृतास्वादेन मनो झटिति शीघ्र विलयं याति द्रवीभूतं भवतीति
भावार्थः ।।१८४।।
अथ जीवः कर्मवशेन जातिभेदभिन्नो भवतीति निश्चिनोति —
३१६) लोउ विलक्खणु कम्म-वसु इत्थु भवंतरि एइ ।
चुज्जु कि जइ इहु अप्पि ठिउ इत्थु जि भवि ण पडेइ ।।१८५।।
लोकः विलक्षणः कर्मवशः अत्र भवान्तरे आयाति ।
आश्चर्यं किं यदि अयं आत्मनि स्थितः अत्रैव भवे न पतति ।।१८५।।
लोउ इत्यादि । विलक्खणु षोडशवर्णिकासुवर्णवत्केवलज्ञानादिगुणसद्रशो न
ଵୀତରାଗ ପରମାନଂଦ ଜେନୁଂ ଏକ ଲକ୍ଷଣ ଛେ ଏଵୀ ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସମାଧିମାଂ ସ୍ଥିତ ଥଈନେ ପରମ
ଅନଂତଜ୍ଞାନାଦି ଗୁଣୋନୋ ଆଧାର ହୋଵାଥୀ ଉତ୍କୃଷ୍ଟ ଏଵା ‘ବ୍ରହ୍ମ ଶବ୍ଦଥୀ ଵାଚ୍ଯ ଏଵା ନିଜଦେହସ୍ଥ
ପରମାତ୍ମାନେ ଭାଵ (ଧ୍ଯାଵ) ଜେ ପରମାତ୍ମାନା ଧ୍ଯାନଥୀ ଵୀତରାଗ ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସମାଧିଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ
ଏକ (କେଵଳ) ପରମାନଂଦମଯ ସୁଖାମୃତନା ଆସ୍ଵାଦଥୀ ମନ ତୁରତ ଜ ନାଶ ପାମେ-ଦ୍ରଵୀଭୂତ ଥାଯ
(ପୀଗଳୀ ଜାଯ). ୧୮୪.
ହଵେ, ଜୀଵ କର୍ମନା ଵଶଥୀ ଜାତିଭେଦଥୀ ଭିନ୍ନ-ଭିନ୍ନ ସ୍ଵରୂପେ ଥାଯ ଛେ (କର୍ମନା ଵଶେ ଜୀଵ
ଭିନ୍ନ-ଭିନ୍ନ ଜାତିଓ ପାମେ ଛେ) ଏମ ନକ୍କୀ କରେ ଛେ : —
ଭାଵାର୍ଥ : — ଆ ଜନସମୁଦାଯ କର୍ମରହିତ ଏଵା ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାନୀ ଅନୁଭୂତିନୀ ଭାଵନାନା
आगे जीवके कर्मके वशसे भिन्न – भिन्न स्वरूप जाति – भेदसे होते हैं, ऐसा निश्चय करते
हैं —
गाथा – १८५
अन्वयार्थ : — [विलक्षणः ] सोलहवानीके सुवर्णकी तरह केवलज्ञानादि गुणकर समान
जो परमात्मतत्त्व उससे भिन्न जो [लोकः ] ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि जाति – भेदरूप
जीव – राशि वह [कर्मवशः ] कर्मके वश उत्पन्न है, अर्थात् जाति – भेद कर्मके निमित्तसे हुआ
है, और वे कर्म आत्म – ज्ञानकी भावनासे रहित अज्ञानी जीवने उपार्जन किये हैं, उन कर्मोंके
आधीन जाति – भेद है, जब तक कर्मोंका उपार्जन है, तब तक [अत्र भवांतरे आयाति ] इस
संसारमें अनेक जाति धारण करता है, [अयं यदि ] जो यह जीव [आत्मनि स्थितः ]
आत्मस्वरूपमें लगे, तो [अत्रैव भवे ] इसी भवमें [न पतति ] नहीं पड़े – भ्रमण नहीं करे, [किं