Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୮୫ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୫୧୧
सर्वजीवराशिसद्रशात् परमात्मतत्त्वाद्विलक्षणो विसद्रशो भवति केन ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य-
शूद्रादिजातिभेदेन कोऽसौ लोउ लोको जनः कथंभूतः सन् कम्म-वसु कर्मरहित-
शुद्धात्मानुभूतिभावनारहितेन यदुपार्जितं कर्म तस्य कर्मण अधीनः कर्मवशः इत्थंभूतः सन्
किं करोति इत्थु भवंतरि एइ पञ्चप्रकारभवरहिताद्वीतरागपरमानन्दैकस्वभावात् शुद्धात्म-
द्रव्याद्विसद्रशे अस्मिन् भवान्तरे संसारे समायाति चुज्जु किं इदं किमाश्चर्यं किंतु नैव, जइ इहु
अप्पि ठिउ यदि चेदयं जीवः स्वशुद्धात्मनि स्थितो भवति तर्हि इत्थु जि भवि ण पडेइ
अत्रैव भवे न पततीति इदमप्याश्चर्यं न भवतीति
अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा संसारभयभीतेन
भव्येन भवकारणमिथ्यात्वादिपञ्चास्रवान् मुक्त्वा द्रव्यभावास्रवरहिते परमात्मभावे स्थित्वा च
निरन्तरं भावना कर्तव्येति तात्पर्यम्
।।१८५।।
ଅଭାଵଥୀ ଜେ କର୍ମ ଉପାର୍ଜ୍ଯୁଂ ଛେ ତେ କର୍ମନେ ଆଧୀନ ଥତୋ ଥକୋ ବ୍ରାହ୍ମଣ, କ୍ଷତ୍ରିଯ, ଵୈଶ୍ଯ, ଶୂଦ୍ରାଦି
ଜାତିନା ଭେଦଥୀ, ସୋଳଵଲା ସୁଵର୍ଣନୀ ଜେମ କେଵଳଜ୍ଞାନାଦି ଗୁଣେ କରୀନେ ସର୍ଵଜୀଵରାଶି ସଦ୍ରଶ ନଥୀ,
ସଦ୍ରଶ ଏଵା ପରମାତ୍ମତତ୍ତ୍ଵଥୀ ଵିଲକ୍ଷଣ
ଵିସଦ୍ରଶ ଛେ(?) ଆଵୋ (ଜନସମୁଦାଯ) ଶୁଂ କରେ ଛେ?
ପାଂଚ ପ୍ରକାରନା ଭଵଥୀ ରହିତ ଵୀତରାଗ ପରମାନଂଦ ଜେନୋ ଏକ ସ୍ଵଭାଵ ଛେ ଏଵୋ ଶୁଦ୍ଧ
ଆତ୍ମଦ୍ରଵ୍ଯଥୀ ଵିସଦ୍ରଶ ଆ ଭଵାନ୍ତରମାଂ-ସଂସାରମାଂ ଆଵେ-ପଡେ ଏମାଂ ଶୁଂ ଆଶ୍ଚର୍ଯ ଛେ? କଂଈପଣ
ଆଶ୍ଚର୍ଯ ନଥୀ. ଜୋ ଆ ଜୀଵ ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାମାଂ ସ୍ଥିତ ଥାଯ ତୋ ଆ ଭଵମାଂ ନ ଜ ପଡେ ତୋ ପଣ
ତେମାଂ ଆଶ୍ଚର୍ଯ ନଥୀ.
ଅହୀଂ, ଆ ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନ ସାଂଭଳୀନେ ସଂସାରଭଯଥୀ ଭଯଭୀତ ଭଵ୍ଯଜୀଵେ ଭଵନା କାରଣରୂପ
ମିଥ୍ଯାତ୍ଵ ଆଦି ପାଂଚ ଆସ୍ରଵୋନେ ଛୋଡୀନେ ଅନେ ଦ୍ରଵ୍ଯାସ୍ରଵ, ଭାଵାସ୍ରଵ ରହିତ ପରମାତ୍ମଭାଵଥୀ ସ୍ଥିତ
ଥଈନେ ନିରଂତର (ଆତ୍ମ) ଭାଵନା କରଵୀ ଜୋଈଏ, ଏଵୁଂ ତାତ୍ପର୍ଯ ଛେ. ୧୮୫.
आश्चर्यं ] इसमें क्या आश्चर्य हैं, कुछ भी नहीं ।।
भावार्थ :जबतक आत्मामें चित्त नहीं लगता, तब तक संसारमें भ्रमण करता है,
अनेक भव धारण करता है, लेकिन जब यह आत्मदर्शी हुआ तब कर्मोंको नहीं उपार्जन
करता, और भवमें भी नहीं भटकता
इसमें आश्चर्य नहीं है संसार-शरीर-भोगोंमें उदास
और जिसको भवभ्रमणका भय उत्पन्न हो गया है, ऐसा भव्य जीव उसको मिथ्यात्व, अव्रत,
कषाय, प्रमाद, योग, इन पाँचों आस्रवोंको छोड़कर परमात्मतत्त्वमें सदैव भावना करनी
चाहिये
जो इसके आत्मभावना होवे तो भवभ्रमण नहीं हो सकता ।।१८५।।
୧. ସଂସ୍କୃତ ଟୀକାମାଂ ଭୂଲ ଲାଗେ ଛେ. କଦାଚ ଆ ପ୍ରମାଣେ ପଣ ହୋଯ : सर्वजीवराशिसदृशात् = सर्वजीवराशिः
द्रशात्