Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୧୨ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୮୬
अथ परेण दोषग्रहणे कृते कोपो न कर्तव्य इत्यभिप्रायं मनसि संप्रधार्य सूत्रमिदं
प्रतिपादयति —
३१७) अवगुण-गहणइँ महुतणइँ जइ जीवहँ संतोसु ।
तो तहँ सोक्खहं हेउ हउँ इउ मण्णिवि चइ रोसु ।।१८६।।
अवगुणग्रहणेन मदीयेन यदि जीवानां संतोषः ।
ततः तेषां सुखस्य हेतुरहं इति मत्वा त्यज रोषम् ।।१८६।।
जइ जीवहं संतोसु यदि चेदज्ञानिजीवानां संतोषो भवति । केन । अवगुण-गहणइं
निर्दोषिपरमात्मनो विलक्षणा ये दोषा अवगुणास्तेषां ग्रहणेन । कथंभूतेन महुतणइं मदीयेन ताे
तहं सोक्खहं हेउ हउँ यतः कारणान्मदीयदोषग्रहणेन तेषां सुखं जातं ततस्तेषामहं सुखस्य
हेतुर्जातः इउ मण्णिवि चउ रोसु केचन परोपकारनिरताः परेषां द्रव्यादिकं दत्त्वा सुखं कुर्वन्ति
ହଵେ, ଜୋ ବୀଜା କୋଈନେ ପୋତାନୋ ଦୋଷ ଗ୍ରହଣ କରଵାଥୀ ସଂତୋଷ ଥାଯ ଛେ ତୋ (ତେନା ପର)
କୋପ ନ କରଵୋ, ଏଵୋ ଅଭିପ୍ରାଯ ମନମାଂ ରାଖୀନେ ଆ ସୂତ୍ର କହେ ଛେ : —
ଭାଵାର୍ଥ : — ନିର୍ଦୋଷ ପରମାତ୍ମାଥୀ ଵିଲକ୍ଷଣ ଜେ ମାରା ଦୋଷୋ ଛେ ତେମନା ଗ୍ରହଣଥୀ ଜୋ
ଅଜ୍ଞାନୀ ଜୀଵୋନେ ସଂତୋଷ ଥାଯ ଛେ ତୋ ମାରା ଦୋଷ ଗ୍ରହଣ କରଵାଥୀ ତେମନେ ସୁଖ ଥଯୁଂ ତେଥୀ ତେମନା
ସୁଖନୋ ହେତୁ ହୁଂ ଥଯୋ. କେଟଲାକ ପରୋପକାରମାଂ ରତ ପୁରୁଷୋ ତୋ ବୀଜାଓନେ ଧନାଦିକ ଆପୀନେ ସୁଖୀ
କରେ ଛେ, ଅନେ ମେଂ ତୋ ତେମନେ ଧନାଦିକ ଆପ୍ଯା ସିଵାଯ ସୁଖୀ କର୍ଯା ଏମ ମାନୀନେ ରୋଷ ଛୋଡ
आगे जो कोई अपने दोष ग्रहण करे तो उस पर क्रोध नहीं करना, क्षमा करना, यह
अभिप्राय मनमें रखकर व्याख्यान करते हैं —
गाथा – १८६
अन्वयार्थ : — [मदीयेन अवगुणग्रहणेन ] अज्ञानी जीवोंको परके दोष ग्रहण करनेसे
हर्ष होता है, मेरे दोष ग्रहण करके [यदि जीवानां संतोषः ] जिन जीवोंको हर्ष होता है, [ततः ]
तो मुझे यही लाभ है, कि [अहं ] मैं [तेषां सुखस्य हेतुः ] उनको सुखका कारण हुआ, [इति
मत्वा ] ऐसा मनमें विचारकर [रोषम् त्यज ] गुस्सा छोड़ो ।
भावार्थ : — ज्ञानी गुस्सा नहीं करते, ऐसा विचारते हैं, कि जो कोई परका उपकार
करनेवाले परजीवोंको द्रव्यादि देकर सुखी करते हैं, मैंने कुछ द्रव्य नहीं दिया, उपकार नहीं
किया, मेरे अवगुण ही से सुखी हो गये, तो इसके समान दूसरी क्या बात है ? ऐसा