Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୧୬ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୮୮
मोक्खु इत्यादि । मोक्खु म चिंतहि मोक्षचिन्तां मा कार्षीस्त्वं जोइया हे योगिन् ।
यतः कारणात् मोक्खु ण चिंतिउ होउ रागादिचिन्ताजालरहितः केवलज्ञानाद्यनन्त-
गुणव्यक्ति सहितो मोक्षः चिन्तितो न भवति । तर्हि कथं भवति । जेण णिबद्धउ जीवडउ येन
मिथ्यात्वरागादिचिन्ताजालोपार्जितेन कर्मणा बद्धो जीवः सोइ तदेव कर्म शुभाशुभविकल्प-
समूहरहिते शुद्धात्मतत्त्वस्वरूपे स्थितानां परमयोगिनां मोक्खु करेसइ अनन्तज्ञानादि-
गुणोपलम्भरूपं मोक्षं करिष्यतीति । अत्र यद्यपि सविकल्पावस्थायां विषयकषायाद्यपध्यान-
वञ्चनार्थं मोक्षमार्गे भावनाद्रढीकरणार्थं च ‘‘दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगईगमणं
समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ती होइ मज्झं’’ इत्यादि भावना कर्तव्या तथापि वीतरागनिर्विकल्प-
परमसमाधिकाले न कर्तव्येति भावार्थः ।।१८८।।
ଭାଵାର୍ଥ : — ହେ ଯୋଗୀ! ତୁଂ ମୋକ୍ଷନୀ ପଣ ଚିଂତା ନ କର, କାରଣ କେ ରାଗାଦି-
ଚିଂତାଜାଳରହିତ ଅନେ କେଵଳଜ୍ଞାନାଦି ଅନଂତ ଗୁଣୋନୀ ଵ୍ଯକ୍ତି ସହିତ ମୋକ୍ଷ, ଚିଂତା କରଵାଥୀ ଥତୋ ନଥୀ.
ତୋ କେଵୀ ରୀତେ ଥାଯ ଛେ? ତେ ଆ ରୀତେ ଥାଯ ଛେ. ମିଥ୍ଯାତ୍ଵ, ରାଗାଦିଚିଂତାଜାଳଥୀ ଉପାର୍ଜିତ ଜେ କର୍ମଥୀ
ଜୀଵ ବଂଧାଯୋ ଛେ, ତେ ଜ କର୍ମ [ତେ ଜ କର୍ମନୋ ଛୂଟକାରୋ] ଶୁଭାଶୁଭଵିକଲ୍ପସମୂହଥୀ ରହିତ ଅନେ
ଶୁଦ୍ଧଆତ୍ମସ୍ଵରୂପମାଂ ସ୍ଥିତ ପରମଯୋଗୀଓନେ ଅନଂତ ଜ୍ଞାନାଦି ଗୁଣୋନୀ ପ୍ରାପ୍ତିରୂପ ମୋକ୍ଷ କରଶେ.
ଅହୀଂ, ଜୋକେ ସଵିକଲ୍ପ ଅଵସ୍ଥାମାଂ ଵିଷଯକଷାଯାଦି ଅପଧ୍ଯାନନା ଵଂଚନାର୍ଥେ ଅନେ ମୋକ୍ଷମାର୍ଗମାଂ
ଭାଵନାନେ ଦ୍ରଢ କରଵା ମାଟେ
‘‘दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो
सुगईगमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ती होउ मज्झं ।।’’
(ଶ୍ରୀ କୁଂଦକୁଂଦାଚାର୍ଯ ପ୍ରାକୃତ ସିଦ୍ଧ ଭକ୍ତି) (ଅର୍ଥ: — ଚାର ଗତିନା ଦୁଃଖ ନାଶ ପାମୋ, କର୍ମନୋ
କ୍ଷଯ ଥାଓ, ବୋଧିଲାଭ ଥାଓ, ସୁଗତିମାଂ (ପଂଚମଗତିମାଂ, ମୋକ୍ଷମାଂ) ଗମନ ଥାଓ; ସମାଧିମରଣ
ଥାଓ ଅନେ ଜିନଗୁଣନୀ ସଂପତ୍ତି ମନେ ମଳୋ.) ଇତ୍ଯାଦି ଭାଵନା କରଵୀ ଯୋଗ୍ଯ ଛେ ତୋପଣ,
ଵୀତରାଗନିର୍ଵିକଲ୍ପ ପରମସମାଧିକାଳେ ତେ କରଵୀ ଯୋଗ୍ଯ ନଥୀ, ଏଵୋ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୧୮୮.
भावार्थ : — वह चिन्ताका त्याग ही तुझको निस्संदेह मोक्ष करेगा । अनंत ज्ञानादि
गुणोंकी प्रगटता वह मोक्ष है । यद्यपि विकल्प सहित जो प्रथम अवस्था उसमें विषय कषायादि
खोटे ध्यानके निवारण करनेके लिये और मोक्ष – मार्गमें परिणाम दृढ़ करनेके लिये ज्ञानीजन ऐसी
भावना करते हैं, कि चतुर्गतिके दुःखोंका क्षय हो, अष्ट कर्मोंका क्षय हो, ज्ञानका लाभ हो,
पंचमगतिमें गमन हो, समाधि मरण हो, और जिनराजके गुणोंकी सम्पत्ति मुझको हो । यह भावना
चौथे, पाँचवें, छट्ठे गुणस्थानमें करने योग्य है, तो भी ऊ परके गुणस्थानोंमें वीतराग
निर्विकल्पसमाधिके समय नहीं होती ।।१८८।।