Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୨୦ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୯୧
घोरं कुर्वन् अपि तपश्चरणं सकलान्यपि शास्त्राणि मन्यमान
परमसमाधिविवर्जितः नैव पश्यति शिवं शान्तम् ।।१९१।।
करंतु वि कुर्वाणाऽपि किम् तव-चरणु समस्तपरद्रव्येच्छावर्जितं शुद्धात्मा-
नुभूतिरहितं तपश्चरणम् कथंभूतम् घोरु घोरं दुर्धरं वृक्षमूलातापनादिरूपम् न केवलं
तपश्चरणं कुर्वन् सयल वि सत्थ मुणंतु शास्त्रजनितविकल्पतात्पर्यरहितात् परमात्मस्वरूपात्
प्रतिपक्षभूतानि सर्वशास्त्राण्यपि जानन् इत्थंभूतोऽपि सन् परम-समाहि-विवज्जयउ यदि
चेद्रागादिविकल्परहितपरमसमाधिविवर्जितो भवति तर्हि णवि देक्खइ न पश्यति कम् सिउ
शिवं शिवशब्दवाच्यं विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावं स्वदेहस्थमपि च परमात्मानम् कथंभूतम् संत
रागद्वेषमोहरहितत्वेन शान्तं परमोपशमरूपमिति इदमत्र तात्पर्यम् यदि निजशुद्धात्मैवोपादेय
ଭାଵାର୍ଥ :ସମସ୍ତ ପରଦ୍ରଵ୍ଯୋନୀ ଇଚ୍ଛାଥୀ ରହିତ ଅନେ ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାନୀ ଅନୁଭୂତିଥୀ ରହିତ
ଏଵୁଂ, ଵୃକ୍ଷନା ମୂଳମାଂ କେ ଆତପନାଦିରୂପ (ଵର୍ଷାକାଳମାଂ ଵୃକ୍ଷନା ମୂଳନୀ ସମୀପମାଂ, ଶୀତକାଳମାଂ
ନଦୀକିନାରେ ଅନେ ଗ୍ରୀଷ୍ମକାଳମାଂ ପର୍ଵତନା ଶିଖର ପର) ଦୁର୍ଧର ତପଶ୍ଚରଣ କରଵା ଛତାଂ ପଣ, ଵଳୀ
ଶାସ୍ତ୍ରଜନିତ ଵିକଲ୍ପୋନା
ତାତ୍ପର୍ଯଥୀ ରହିତ ଏଵାପରମାତ୍ମସ୍ଵରୂପଥୀ ପ୍ରତିପକ୍ଷଭୂତ ସର୍ଵ ଶାସ୍ତ୍ରୋନେ
ଜାଣଵା ଛତାଂ ପଣ–(ଆଵୋ ହୋଵା ଛତାଂ ପଣ) ଜୋ ମୁନି ରାଗାଦିଵିକଲ୍ପଥୀ ରହିତ ଏଵୀ
ପରମସମାଧିଥୀ ରହିତ ଛେ, ତୋ ତେ ରାଗଦ୍ଵେଷମୋହସହିତ ହୋଵାଥୀ ପରମୋପଶମରୂପ ଶାଂତ, ‘ଶିଵ’ ଶବ୍ଦଥୀ
ଵାଚ୍ଯ ଏଵା ଵିଶୁଦ୍ଧଜ୍ଞାନ, ଵିଶୁଦ୍ଧଦର୍ଶନ ଜେନୋ ସ୍ଵଭାଵ ଛେ ଏଵା ଅନେ ସ୍ଵଦେହମାଂ ସ୍ଥିତ ପରମାତ୍ମାନେ
ଦେଖୀ ଶକତୋ ନଥୀ.
गाथा१९१
अन्वयार्थ :[घोरं तपश्चरणं कुर्वन् अपि ] जो मुनि महा दुर्धर तपश्चरण करता
हुआ भी और [सकलानि शास्त्राणि ] सब शास्त्रोंको [जानन् ] जानता हुआ भी
[परमसमाधिविवर्जितः ] जो परमसमाधिसे रहित है, वह [शांतम् शिवं ] शांतरूप शुद्धात्माको
[नैव पश्यति ] नहीं देख सकता
।।
भावार्थ :तप उसे कहते हैं, कि जिसमें किसी वस्तुकी इच्छा न हो सो
इच्छाका अभाव तो हुआ नहीं, परंतु कायक्लेश करता है, शीतकालमें नदीके तीर,
ग्रीष्मकालमें पर्वतके शिखर पर, वर्षाकालमें वृक्षकी मूलमें महान् दुर्धर तप करता है
केवल तप ही नहीं करता शास्त्र भी पढ़ता है, सकल शास्त्रोंके प्रबंधसे रहित जो
निर्विकल्प परमात्मस्वरूप उससे रहित हुआ सीखता है, शास्त्रोंका रहस्य जानता है, परंतु
परमसमाधिसे रहित है, अर्थात् रागादि विकल्पसे रहित समाधि जिसके प्रगट न हुई, तो