Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 522 of 565
PDF/HTML Page 536 of 579

background image
Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୨୨ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୯୨
विषयकषायानपि निर्दल्य ये न समाधिं कुर्वन्ति
ते परमात्मनः योगिन् नैव आराधका भवन्ति ।।१९२।।
जे ये केचन ण करंति न कुर्वन्ति कम् समाहि त्रिगुप्तिगुप्त परमसमाधिम् किं
कृत्वा पूर्वम् णिद्दलिवि निर्मूल्य कानपि विषय-कसाय वि निर्विषयकषायात्
शुद्धात्मतत्त्वात् प्रतिपक्षभूतान् विषयकषायानपि ते णवि आराहय होंति ते नैवाराधका
भवन्ति
जोइया हे योगिन्
कस्याराधका न भवन्ति परमप्पहं निर्दोषिपरमात्मन इति
तथाहि विषयकषायनिवृत्तिरूपं शुद्धात्मानुभूतिस्वभावं वैराग्यं, शुद्धात्मोपलब्धिरूपंतत्त्वविज्ञानं,
बाह्याभ्यन्तरपरिग्रहपरित्यागरूपं नैर्ग्रन्थ्यं, निश्चितात्मानुभूतिरूपा वशचित्तता, वीतरागनिर्विकल्प-
समाधिबहिरङ्गसहकारिभूतं जितपरिषहत्वं चेति पञ्चैतान् ध्यानहेतून् ज्ञात्वा भावयित्वा च
ଭାଵାର୍ଥ :ହେ ଯୋଗୀ! ଜେ କୋଈ ଵିଷଯକଷାଯ ରହିତ-ଶୁଦ୍ଧ-ଆତ୍ମତତ୍ତ୍ଵଥୀ ପ୍ରତିପକ୍ଷଭୂତ
ଵିଷଯକଷାଯୋନେ ପଣ ନିର୍ମୂଳ କରୀନେ (ମୂଳମାଂଥୀ ଉଖେଡୀନେ) ତ୍ରଣ ଗୁପ୍ତିଥୀ ଗୁପ୍ତ ପରମସମାଧିନେ କରତା
ନଥୀ, ତେଓ ନିର୍ଦୋଷ ପରମାତ୍ମାନା ଆରାଧକୋ ଜ ନଥୀ.
ଭାଵାର୍ଥ :(୧) ଵିଷଯକଷାଯନୀ ନିଵୃତ୍ତିରୂପ ଅନେ ଶୁଦ୍ଧଆତ୍ମାନୀ ଅନୁଭୂତି-ସ୍ଵଭାଵଵାଳୋ
ଵୈରାଗ୍ଯ, (୨) ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାନୀ ଉପଲବ୍ଧିରୂପ ତତ୍ତ୍ଵଵିଜ୍ଞାନ, (୩) ବାହ୍ଯ ଅଭ୍ଯଂତର ପରିଗ୍ରହନା ତ୍ଯାଗରୂପ
ନିର୍ଗ୍ରଂଥପଣୁଂ, (୪) ନିଶ୍ଚିତ ଆତ୍ମାନୀ ଅନୁଭୂତିରୂପ ଚିତ୍ତଵଶତା (ମନୋଜଯ) ଅନେ (୫) ଵୀତରାଗ
ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସମାଧିନା ବହିରଂଗ ସହକାରୀଭୂତ ପରିଷହଜଯ ଏ ପାଂଚ ଧ୍ଯାନନା ହେତୁ ଜାଣୀନେ ଅନେ ତେନେ
गाथा१९२
अन्वयार्थ :[ये ] जो [विषयकषायानपि ] समाधिको धारणकर विषय कषायोंको
[निर्दल्य ] मूलसे उखाड़कर [समाधिं ] तीन गुप्तिरूप परमसमाधिको [न कुर्वंति ] नहीं धारण
करते, [ते ] वे [योगिन् ] हे योगी, [परमात्माराधकाः ] परमात्माके आराधक [नैव भवंति ]
नहीं हैं
भावार्थ :ये विषय कषाय शुद्धात्मतत्त्वके शत्रु हैं, जो इनका नाश न करे, वह
स्वरूपका आराधक कैसा ? स्वरूपको वही आराधता है, जिसके विषय कषायका प्रसंग न
हो, सब दोषोंसे रहित जो निज परमात्मा उसकी आराधनाके घातक विषय कषायके सिवाय
दूसरा कोई भी नहीं है
विषय कषायकी निवृत्तिरूप शुद्धात्माकी अनुभूति वह वैराग्यसे ही देखी
जाती है इसलिये ध्यानका मुख्य कारण वैराग्य है जब वैराग्य हो तब तत्त्वज्ञान निर्मल हो,
सो वैराग्य और तत्त्वज्ञान ये दोनों परस्परमें मित्र हैं ये ही ध्यानके कारण हैं, और बाह्याभ्यन्तर
परिग्रहके त्यागरूप निर्ग्रन्थपना वह ध्यानका कारण है निश्चित आत्मानुभूति ही है स्वरूप