Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୨୬ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୯୫
तदनन्तरमर्हत्पदमिति भावमोक्ष इति जीवन्मोक्ष इति केवलज्ञानोत्पत्तिरित्येकोऽर्थः तस्य
चतुर्विधनामाभिधेयस्यार्हत्पदस्य प्रतिपादनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयपर्यन्तं व्याख्यानं करोति । तद्यथा —
३२६) सयल – वियप्पहँ तुट्टाहँ सिव – पय – मग्गि वसंतु ।
कम्म-चउक्कइ विलउ गइ अप्पा हुइ अरहंतु ।।१९५।।
सकलविकल्पानां त्रुटयतां शिवपदमार्गे वसन् ।
कर्मचतुष्के विलयं गते आत्मा भवति अर्हन् ।।१९५।।
हुइ भवति । कोऽसौ । अप्पा आत्मा । कथंभूतो भवति । अरहंतु अरिर्मोहनीयं कर्म
तस्य हननाद् रजसी ज्ञानद्रगावरणे तयोरपि हननाद् रहस्यशब्देनान्तरायस्तदभावाच्च
देवेन्द्रादिविनिर्मितामतिशयवतीं पूजामर्हतीत्यर्हन् । कस्मिन् सति । कम्म-चउक्कइ विलउ गइ
ତ୍ଯାର ପଛୀ ଅର୍ହଂତପଦ କହୋ, ଭାଵମୋକ୍ଷ କହୋ, ଜୀଵନ୍ମୋକ୍ଷ କହୋ, କେଵଳଜ୍ଞାନୋତ୍ପତ୍ତି କହୋ : —
ଏ ଚାରେ ଶବ୍ଦନୋ ଅର୍ଥ ଏକ ଜ ଛେ. ଏ ଚାର ପ୍ରକାରନା ନାମ ଜେନା ଛେ ତେ ଅର୍ହଂତପଦନା ପ୍ରତିପାଦନନୀ
ମୁଖ୍ଯତାଥୀ ତ୍ରଣ ଗାଥାସୂତ୍ର ସୁଧୀ ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନ କରେ ଛେ. ତେ ଆ ପ୍ରମାଣେ : —
ଭାଵାର୍ଥ : — ‘ଶିଵ’ ଶବ୍ଦଥୀ ଵାଚ୍ଯ ଏଵୁଂ ଜେ ମୋକ୍ଷପଦ ତେନୋ ସମ୍ଯଗ୍ଦର୍ଶନ, ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ,
ସମ୍ଯକ୍ଚାରିତ୍ର ଏ ତ୍ରଣେଯନୀ ଏକତାରୂପ ଲକ୍ଷଣଵାଳୋ ଜେ ମାର୍ଗ ତେମାଂ ଵସତା ଥକା ଆତ୍ମା, ପୂର୍ଵେ
ସମସ୍ତଵିକଲ୍ପୋନୋ ନାଶ ଥତାଂ ଅର୍ଥାତ୍ ସମସ୍ତ ରାଗାଦି ଵିକଲ୍ପୋନୋ ନାଶ ଥଯା ପଛୀ ଚାର ଘାତିକର୍ମନୋ
आगे तीन दोहोंमें अरहंतपदका व्याख्यान करते हैं, अरहंतपद कहो या भावमोक्ष कहो,
अथवा जीवन्मोक्ष कहो, या केवलज्ञानकी उत्पत्ति कहो —
ये चारों अर्थ एकको ही सूचित करते हैं, अर्थात् चारों शब्दोंका अर्थ एक ही है —
गाथा – १९५
अन्वयार्थ : — [कर्मचतुष्के विलयं गते ] ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी, मोहनी, और
अन्तराय इन चार घातियाकर्मोंके नाश होनेसे [आत्मा ] यह जीव [अर्हन् भवति ] अर्हंत होता
है, अर्थात् जब घातियाकर्म विलय हो जाते हैं, तब अरहंतपद पाता है, देवेंद्रादिकर पूजाके योग्य
हो वह अरहंत है, क्योंकि पूजायोग्यको ही अर्हंत कहते हैं । पहले तो महामुनि हुआ
[शिवपदमार्गे वसन् ] मोक्षपदके मार्गरूप सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रमें ठहरता हुआ
[सकलविकल्पानां ] समस्त रागादि विकल्पोंका [त्रुटयतां ] नाश करता है, अर्थात् जब समस्त
रागादि विकल्पोंका नाश हो जावे, तब निर्विकल्प ध्यानके प्रसादसे केवलज्ञान होता है ।