Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୩୦ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୯୮
तथा चोक्त म् — ‘‘जीवा जिणवर जो मुणइ जिणवर जीव मुणेइ । सो समभावि परिट्ठयउ
लहु णिव्वाणु लहेइ ।।’’ ।।१९७।। एवं चतुर्विंशतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये अर्हदवस्थाकथन-
मुख्यत्वेन सूत्रत्रयेण द्वितीयमन्तरस्थलं गतम् ।
अत ऊर्ध्वं परमात्मप्रकाशशब्दस्यार्थकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयपर्यन्तं व्याख्यानं करोति ।
तद्यथा —
३२९) सयलहँ कम्महँ दोसहँ वि जो जिणु देउ विभिण्णु ।
सो परमप्प-पयासु तुहुँ जोइय णियमेँ मण्णु ।।१९८।।
सकलेभ्यः कर्मभ्यः दोषेभ्यः अपि यो जिनः देवः विभिन्नः ।
तं परमात्मप्रकाशं त्वं योगिन् नियमेन मन्यस्व ।।१९८।।
ସ୍ଵରୂପ ଛେ, ଏ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ଵଳୀ କହ୍ଯୁଂ ପଣ ଛେ କେ — १‘‘जीवा जिणवर जो मुणइ जिणवर जीव मुणेइ । सो
समभावि परिट्ठियउ लहु णिव्वाणु लहेइ ।।’’ (ଅର୍ଥ: — ଜେ ଜୀଵୋନେ ଜିନଵର ଜାଣେ ଛେ ଅନେ ଜିନଵରନେ ଜୀଵ
ଜାଣେ ଛେ ତେ ସମଭାଵମାଂ ସ୍ଥିତ ଥଈନେ ଶୀଘ୍ର ନିର୍ଵାଣନେ ପାମେ ଛେ.) ୧୯୭.
ଏ ପ୍ରମାଣେ ଚୋଵୀସ ସୂତ୍ରୋନା ମହାସ୍ଥଳମାଂ ଅର୍ହଂତ-ଅଵସ୍ଥାନା କଥନନୀ ମୁଖ୍ଯତାଥୀ ତ୍ରଣ
ଗାଥାସୂତ୍ରୋଥୀ ବୀଜୁଂ ଅନ୍ତରସ୍ଥଳ ସମାପ୍ତ ଥଯୁଂ.
ଆନା ପଛୀ ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ ଶବ୍ଦନା ଅର୍ଥନା କଥନନୀ ମୁଖ୍ଯତାଥୀ ତ୍ରଣ ଦୋହାସୂତ୍ର ସୁଧୀ
ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନ କରେ ଛେ ତେ ଆ ପ୍ରମାଣେ : —
द्रव्यार्थिकनयकर जीव और जिनवरमें जातिभेद नहीं मानते, वे मोक्ष पाते हैं ।।१९७।।
इसप्रकार चौबीस दोहोंके महास्थलमें अरहंतदेवके कथनकी मुख्यतासे तीन दोहोंमें
दूसरा अंतरस्थल कहा ।
आगे परमात्मप्रकाश शब्दके अर्थके कथनकी मुख्यतासे तीन दोहा कहते हैं —
गाथा – १९८
अन्वयार्थ : — [सकलेभ्यः कर्मभ्यः ] ज्ञानावरणादि अष्टकर्मोंसे [दोषेभ्यः अपि ] और
सब क्षुधादि अठारह दोषोंसे [विभिन्नः ] रहित [यः जिनदेवः ] जो जिनेश्वरदेव हैं, [तं ] उसको
[योगिन् त्वं ] हे योगी, तू [परमात्मप्रकाशं ] परमात्मप्रकाश [नियमेन ] निश्चयसे [मन्यस्व ]
मान । अर्थात् जो निर्दोष जिनेन्द्रदेव हैं, वही परमात्मप्रकाश हैं ।
୧ ଜୁଓ ଷଟ୍ପ୍ରାଭୃତ ଟୀକା ପୃ. ୩୪୨.