Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୦୬ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୫୪୧
लयंति गृह्णन्ति जे ये विवेकिनः णाउ नाम कस्य परमप्प-पयासयहं व्यवहारेण
परमात्मप्रकाशाभिधानग्रन्थस्य निश्चयेन तु परमात्मप्रकाशशब्दवाच्यस्य केवलज्ञानाद्य-
नन्तगुणस्वरूपस्य परमात्मपदार्थस्य
कथम् अणुदिणु अनवरतम् तेषां कि फ लं भवति तुट्टइ
नश्यति कोऽसौ मोहु निर्मोहात्मद्रव्याद्विलक्षणो मोहः तडत्ति झटिति तहं तेषाम् न केवलं
मोहो नश्यति तिहुयण-णाह हवंति तेन पूर्वोक्ते न निर्मोहशुद्धात्मतत्त्वभावनाफ लेन पूर्वं
देवेन्द्रचक्रवर्त्यादिविभूतिविशेषं लब्ध्वा पश्चाज्जिनदीक्षां गृहीत्वा च केवलज्ञानमुत्पाद्य त्रिभुवननाथा
भवन्तीति भावार्थः
।।२०६।। एवं चतुर्विंशतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये परमात्मप्रकाशभावनाफ ल-
कथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयेण पञ्चमं स्थलं गतम्
अथ परमात्मप्रकाशशब्दवाच्यो योऽसौ परमात्मा तदाराधकपुरुषलक्षणज्ञापनार्थं सूत्रत्रयेण
व्याख्यानं करोति तद्यथा
परमात्मपदार्थका [अनुदिनं ] सदैव [नामं गृह्णन्ति ] नाम लेते हैं, सदा उसीका स्मरण करते
हैं, [तेषां ] उनका [मोहः ] निर्मोह आत्मद्रव्यसे विलक्षण जो मोहनामा कर्म [झटिति
त्रुटयति ] शीघ्र ही टूट जाता है, और वे [त्रिभुवननाथा भवंति ] शुद्धात्मतत्त्वकी भावनाके
फ लसे पूर्व देवेंद्र चक्रवर्त्यादिकी महान् विभूति पाकर चक्रवर्तीपदको छोड़कर जिनदीक्षा ग्रहण
करके केवलज्ञानको उत्पन्न कराके तीन भुवनके नाथ होते हैं, यह सारांश हैं
।।२०६।।
इसप्रकार चौबीस दोहोंके महास्थलमें परमात्मप्रकाशकी भावनाके फ लके कथनकी
मुख्यतासे तीन दोहोंमें पाँचवाँ अंतरस्थल कहा
आगे परमात्मप्रकाश शब्दसे कहा गया जो प्रकाशरूप शुद्ध परमात्मा उसकी आराधनाके
करनेवाले महापुरुषोंके लक्षण जाननेके लिये तीन दोहोंमें व्याख्यान करते हैं
ଭାଵାର୍ଥ :ଜେ କୋଈ ଵିଵେକୀ ଜୀଵୋ ଵ୍ଯଵହାରଥୀ ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ ନାମନା ଗ୍ରଂଥନୁଂ ଅନେ
ନିଶ୍ଚଯଥୀ ପରମାତ୍ମ ଶବ୍ଦଥୀ ଵାଚ୍ଯ ଏଵା କେଵଳଜ୍ଞାନାଦି ଅନଂତଗୁଣସ୍ଵରୂପ ପରମାତ୍ମପଦାର୍ଥନୁଂ ସତତ
ନାମ ଲେ ଛେ ତେମନୋ ନିର୍ମୋହ
ଆତ୍ମଦ୍ରଵ୍ଯଥୀ ଵିଲକ୍ଷଣ ମୋହ ଶୀଘ୍ର ନାଶ ପାମେ ଛେ. କେଵଳ ମୋହ ଜ ନାଶ
ପାମେ ଛେ ଏଟଲୁଂ ଜ ନହି ପଣ ତେ ପୂର୍ଵୋକ୍ତ ନିର୍ମୋହଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମତତ୍ତ୍ଵନୀ ଭାଵନାନା ଫଳଥୀ ପହେଲାଂ
ଦେଵେନ୍ଦ୍ର, ଚକ୍ରଵର୍ତୀ ଆଦି ଵିଭୂତିଵିଶେଷନେ ପାମୀନେ ଅନେ ପଛୀ ଜିନଦୀକ୍ଷା ଗ୍ରହୀନେ କେଵଳଜ୍ଞାନ ଉତ୍ପନ୍ନ
କରୀନେ ତ୍ରଣ ଭୁଵନନା ନାଥ ଥାଯ ଛେ, ଏ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୨୦୬.
ଏ ପ୍ରମାଣେ ଚୋଵୀଶ ସୂତ୍ରୋନା ମହାସ୍ଥଳମାଂ ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶନୀ ଭାଵନାନା ଫଳନା କଥନନୀ
ମୁଖ୍ଯତାଥୀ ତ୍ରଣ ଗାଥାସୂତ୍ରୋଥୀ ପାଂଚମୁଂ ସ୍ଥଳ ସମାପ୍ତ ଥଯୁଂ.
ହଵେ, ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ ଶବ୍ଦଥୀ ଵାଚ୍ଯ ଏଵୋ ଜେ ପରମାତ୍ମା, ତେନା ଆରାଧକ ପୁରୁଷୋନାଂ ଲକ୍ଷଣ
ଜାଣଵା ମାଟେ ଗାଥାସୂତ୍ରଥୀ ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନ କରେ ଛେ. ତେ ଆ ପ୍ରମାଣେ :