Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-207 (Adhikar 2) Paramatmaprakash Mate Yogya Purush.

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୪୨ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୦୭
३३८) जे भवदुक्खहँ बीहिया पउ इच्छहिँ णिव्वाणु
इह परमप्प-पयासयहँ ते पर जोग्ग वियाणु ।।२०७।।
ये भवदुःखेभ्यः भीताः पदं इच्छन्ति निर्वाणम्
इह परमात्मप्रकाशकस्य ते परं योग्या विजानीहि ।।२०७।।
ते पर त एव जोग्ग वियाणु योग्या भवन्तीति विजानीहि कस्य इह परमप्प-पयासयह
व्यवहारेणास्य परमात्मप्रकाशाभिधानग्रन्थस्य, परमार्थेन तु परमात्मप्रकाशशब्दवाच्यस्य निर्दोषि-
परमात्मनः
ते के जे बीहिया ये भीताः केषाम् भव-दुक्खहं रागादिविकल्परहितपरमाह्लाद-
रूपशुद्धात्मभावनोत्थपारमार्थिकसुखविलक्षणानां नारकादिभवदुःखानाम् पुनरपि किं कुर्वन्ति जे
इच्छहिं ये इच्छन्ति किम् पउ पदं स्थानम् णिव्वाणु निर्वृतिगतपरमात्माधारभूतं
निर्वाणशब्दवाच्यं मुक्ति स्थानमित्यभिप्रायः ।।२०७।।
गाथा२०७
अन्वयार्थ :[ते परं ] वे ही महापुरुष [अस्य परमात्मप्रकाशकस्य ] इस
परमात्मप्रकाश ग्रंथके अभ्यास करनेके [योग्याः विजानीहि ] योग्य जानो, [ये ] जो
[भवदुःखेभ्यः ] चतुर्गतिरूप संसारके दुःखोंसे [भीताः ] डर गये हैं, और [निर्वाणम् पदं ]
मोक्षपदको [इच्छंति ] चाहते हैं
भावार्थ :व्यवहारनयकर परमात्मप्रकाशनामा ग्रंथकी और निश्चयनयकर निर्दोष
परमात्मतत्त्वकी भावनाके योग्य वे ही हैं, जो रागादि विकल्प रहित परम आनंदरूप
शुद्धात्मतत्त्वकी भावनासे उत्पन्न हुए अतीन्द्रिय अविनश्वर सुखसे विपरीत जो नरकादि संसारके
दुःख उनसे डर गये हैं, जिनको चतुर्गतिके भ्रमणका डर है, और जो सिद्धपरमेष्ठीके निवास
मोक्षपदको चाहते हैं
।।२०७।।
ଭାଵାର୍ଥ :ତେଓ ଜ ଵ୍ଯଵହାରଥୀ ଆ ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ ନାମନା ଗ୍ରଂଥନେ ଅନେ ପରମାର୍ଥଥୀ
ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ ଶବ୍ଦଥୀ ଵାଚ୍ଯ ଏଵା ନିର୍ଦୋଷ ପରମାତ୍ମାନେ ଯୋଗ୍ଯ ଛେ, ଏମ ଜାଣୋକେ ଜେଓ
ରାଗାଦି ଵିକଲ୍ପୋଥୀ ରହିତ ପରମ ଆହ୍ଲାଦରୂପ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାନୀ ଭାଵନାଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ପାରମାର୍ଥିକ
ସୁଖଥୀ ଵିଲକ୍ଷଣ ନାରକାଦି ଭଵଦୁଃଖୋଥୀ ଭଯଭୀତ ଛେ ଅନେ ଜେଓ ନିର୍ଵୃତିଗତ (ମୋକ୍ଷପ୍ରାପ୍ତ)
ପରମାତ୍ମାନା ଆଧାରଭୂତ ‘ନିର୍ଵାଣ’ ଶବ୍ଦଥୀ ଵାଚ୍ଯ ଏଵା ମୁକ୍ତିସ୍ଥାନନେ ଇଚ୍ଛେ ଛେ, ଏ ଅଭିପ୍ରାଯ
ଛେ. ୨୦୭.