Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-212 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୧୧ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୫୪୭
इत्थु इत्यादि इत्थु अत्र ग्रन्थे ण लेवउ न ग्राह्यः कैः पंडियहिँ पण्डितैर्विवेकिभिः
कोऽसौ गुण-दोसु वि गुणो दोषोऽपि कथंभूतः पुणरुत्तु पुनरुक्त : कस्मान्न ग्राह्यः यतः
मइँ पुणु पुणु वि पउत्तु मया पुनः पुनः प्रोक्त म् किं तत् वीतरागपरमात्मतत्त्वम् किमर्थम्
भट्ट-पभायर-कारणइँ प्रभाकरभट्टनिमित्तेनेति अत्र भावनाग्रन्थे समाधिशतकादिवत् पुनरुक्त दूषणं
नास्ति इति तदपि कस्मादिति चेत् अर्थं पुनःपुनश्चिन्तनलक्षणमिति वचनादिति मत्वा
प्रभाकरभट्टव्याजेन समस्तजनानां सुखबोधार्थं बहिरन्तःपरमात्मभेदेन तु त्रिविधात्मतत्त्वं
बहुधाप्युक्त मिति भावार्थः
।।२११।।
अथ
३४३) जं मइँ किं पि विजंपियउ जुत्ताजुत्तु वि इत्थु
तं वरणाणि खमंतु महु जे बुज्झहिँ परमत्थु ।।२१२।।
ग्रहण नहीं करें, और कविकलाका गुण भी न लें, क्योंकि [मया ] मैंने [भट्टप्रभाकरकारणेन ]
प्रभाकरभट्टके संबोधनके लिए [पुनः पुनरपि प्रोक्तम् ] वीतराग परमानंदरूप परमात्मतत्त्वका
कथन बार
बार किया है ।।
भावार्थ :इस शुद्धात्मभावनाके ग्रंथमें पुनरुक्तका दोष नहीं लगता समाधितंत्र
ग्रंथकी तरह इस ग्रंथमें भी बार बार शुद्ध स्वरूपका ही कथन किया है, बारम्बार उसी अर्थका
चिंतवन है, ऐसा जानकर इसका रहस्य (अभिप्राय) बार बार चिंतवना
प्रभाकरभट्टकी
मुख्यताकर समस्त जीवोंको सुखसे प्रतिबोध होनेके लिये इस ग्रंथमें बारबार बहिरात्मा
अंतरात्मा और परमात्माका कथन किया है, ऐसा जानना ।।२११।।
आगे श्रीयोगीन्द्राचार्य ज्ञानीजनोंसे प्रार्थना करते हैं, कि मैंने जो किसी जगह छंद
अलंकारादिमें युक्त-अयुक्त कहा हो, तो उसे पंडितजन परमार्थके जाननेवाले मुझ पर क्षमा करें
ଭାଵାର୍ଥ :(ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାନୀ) ଭାଵନାନା ଆ ଗ୍ରଂଥମାଂ, ସମାଧିଶତକ ଆଦି ଗ୍ରଂଥନୀ ଜେମ,
ପୁନରୁକ୍ତିନୋ ଦୋଷ ଆଵତୋ ନଥୀ, କାରଣ କେ ଅର୍ଥ ଵାରଂଵାର ଚିଂତନସ୍ଵରୂପ ଛେ. ‘(ଅର୍ଥନୁଂ ଚିଂତନ ଵାରଂଵାର
କରଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ.)’ ଏଵୁଂ ଆଗମନୁଂ ଵଚନ ଛେ ଏମ ଜାଣୀନେ ପ୍ରଭାକରଭଟ୍ଟନା ବହାନେ ସମସ୍ତ ଜନୋନେ
ସୁଖଥୀ ବୋଧ ଥାଯ ଏ ହେତୁଥୀ ବହିରାତ୍ମା, ଅନ୍ତରାତ୍ମା ଅନେ ପରମାତ୍ମାନା ଭେଦଥୀ ତ୍ରଣ ପ୍ରକାରନା
ଆତ୍ମତତ୍ତ୍ଵନୁଂ ଅନେକ ପ୍ରକାରେ ପଣ କଥନ କରଵାମାଂ ଆଵ୍ଯୁଂ ଛେ, ଏମ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୨୧୧.
ଵଳୀ, ହଵେ ଶ୍ରୀ ଯୋଗୀନ୍ଦ୍ରାଚାର୍ଯ ଜ୍ଞାନୀ ଜନୋନେ ପ୍ରାର୍ଥନା କରେ ଛେ କେ ମେଂ କୋଈ ଜଗ୍ଯାଏ ଛଂଦ,
ଅଲଂକାର ଆଦିମାଂ ଯୋଗ୍ଯ, ଅଯୋଗ୍ଯ କହ୍ଯୁଂ ହୋଯ ତୋ ତେନାପରମାର୍ଥନା ଜାଣନାର ପଂଡିତଜନ ମନେ କ୍ଷମା
କରେ :