Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-211 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୪୬ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୧୧
परमप्पपयासु एष परमात्मप्रकाशः एवंगुणविशिष्टोऽयं किं करोति कुणइ करोति कम्
चउ-गइ-दुक्ख-विणासु चतुर्गतिदुःखविनाशम् कथंभूतः सन् भावियउ भावितः केन
सुहावइं शुद्धभावेनेति तथाहि यद्यप्ययं परमात्मप्रकाशग्रन्थः शास्त्रक्रमव्यवहारेण दोहकछन्दसा
प्राकृतलक्षणेन च युक्त :, तथापि निश्चयेन परमात्मप्रकाशशब्दवाच्यशुद्धात्मस्वरूपापेक्षया लक्षण-
छन्दोविवर्जितः
एवंभूतः सन्नयं किं करोति शुद्धभावनया भावितः सन् शुद्धात्म-
संवित्तिसमुत्पन्नरागादिविकल्परहितपरमानन्दैकलक्षणसुखविपरीतानां चतुर्गतिदुःखानां विनाशं
करोतीति भावार्थः
।।२१०।।
अथ श्रीयोगीन्द्रदेव औद्धत्यं परिहरति
३४२) इत्थु ण लेवउ पंडियहिँ गुण-दोसु वि पुणरुत्तु
भट्ट-पभायर-कारणइँ मइँ पुणु पुणु वि पउत्तु ।।२११।।
अत्र न ग्राह्यः पण्डितैः गुणो दोषोऽपि पुनरुक्त :
भट्टप्रभाकरकारणेन मया पुनः पुनरपि प्रोक्त म् ।।२११।।
लक्षणोंकर रहित है, और जिसके कोई प्रबंध नहीं, अनंतरूप है, उपयोगलक्षणमय परमानंद
लक्षणस्वरूप है, सो भावोंसे उसको आराधो, वही चतुर्गतिके दुःखोंका नाश करनेवाला है
शुद्ध परमात्मा तो व्यवहार लक्षण और श्रुतरूप छंदोंसे रहित है, इनसे भिन्न निज लक्षणमयी
है, और यह परमात्मप्रकाशनामा अध्यात्म
ग्रंथ यद्यपि दोहेके छंदरूप है, और प्राकृत लक्षणरूप
है, परंतु इसमें स्वसंवेदनज्ञानकी मुख्यता है, छंद अलंकारादिकी मुख्यता नहीं है ।।२१०।।
आगे श्रीयोगींद्रदेव उद्धतपनेका त्याग दिखलाते हैं
गाथा२११
अन्वयार्थ :[यत्र ] श्रीयोगींद्रदेव कहते हैं, अहो भव्यजीवो, इस ग्रंथमें
[पुनरुक्तः ] पुनरुक्तिका [गुणो दोषोऽपि ] दोष भी [पंडितैः ] आप पंडितजन [न ग्राह्यः ]
ପ୍ରାକୃତଲକ୍ଷଣଥୀ ଯୁକ୍ତ ଛେ ତୋପଣ ନିଶ୍ଚଯଥୀ ‘ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ’ ଶବ୍ଦଥୀ ଵାଚ୍ଯ ଏଵା ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମସ୍ଵରୂପନୀ
ଅପେକ୍ଷାଏ ଲକ୍ଷଣ ଅନେ ଛଂଦଥୀ ରହିତ ଛେ ଏଵୋ ଆ ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ ଶୁଦ୍ଧଭାଵନାଥୀ ଭାଵଵାମାଂ ଆଵତୋ
ଥକୋ, ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମସଂଵିତ୍ତିଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ରାଗାଦି ଵିକଲ୍ପ ରହିତ ପରମାନଂଦ ଜେନୁଂ ଏକ ଲକ୍ଷଣ ଛେ ଏଵା ସୁଖଥୀ
ଵିପରୀତ ଚାର ଗତିନାଂ ଦୁଃଖୋନୋ ଵିନାଶ କରେ ଛେ, ଏ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୨୧୦.
ହଵେ, ଶ୍ରୀ ଯୋଗୀନ୍ଦ୍ରଦେଵ ଉଦ୍ଧତପଣାନୋ ପରିହାର କରେ ଛେ :