Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୫୪ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଟୀକାକାରନୁଂ ଅଂତିମ କଥନ
निश्चयरत्नत्रयात्मनिर्विकल्पसमाधिसंजातवीतरागसहजानन्दरूपसुखानुभूतिमात्रलक्षणेन स्वसंवेदन-
ज्ञानेन स्वसंवेद्यो गम्यः प्राप्यो भरितावस्थोऽहं, रागद्वेषमोहक्रोधमानमायालोभपञ्चेन्द्रियविषय-
व्यापारमनवचनकायव्यापारभावकर्मद्रव्यकर्मनोकर्मख्यातिपूजालाभद्रष्टश्रुतानुभूतभोगाकांक्षारूप-
निदान्मायामिथ्याशल्यत्रयादिसर्वविभावपरिणामरहितशून्योऽहं, जगत्त्रये कालत्रयेऽपि मनवचन-
कायैः कृतकारितानुमतैश्च शुद्धनिश्चयनयेन । तथा सर्वेऽपि जीवाः, इति निरन्तरं भावना
कर्तव्येति ।। ग्रन्थसंख्या ।।४०००।।
पांडवरामहिं णरवरहिं पुज्जिउ भत्तिभरेण ।
सिरिसासणु जिणभासियउ णंदउ सुक्खसएहिं ।।१।।
‘‘ଶୁଦ୍ଧନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ହୁଂ ଏକ (କେଵଳ) ତ୍ରଣ ଲୋକମାଂ, ତ୍ରଣ କାଳମାଂ ମନଵଚନକାଯାଥୀ ଅନେ କୃତ-କାରିତ
-ଅନୁମୋଦନଥୀ ଉଦାସୀନ ଛୁଂ. ନିଜ ନିରଂଜନ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାନା ସମ୍ଯକ୍ଶ୍ରଦ୍ଧାନ, ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ ଅନେ
ସମ୍ଯଗ୍ଅନୁଷ୍ଠାନରୂପ ନିଶ୍ଚଯରତ୍ନତ୍ରଯାତ୍ମକ ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସମାଧିଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ଵୀତରାଗ ସହଜାନଂଦରୂପ
ସୁଖାନୁଭୂତିମାତ୍ର ଲକ୍ଷଣଵାଳା ସ୍ଵସଂଵେଦନଜ୍ଞାନଥୀ ସ୍ଵସଂଵେଦ୍ଯ, ଗମ୍ଯ, ପ୍ରାପ୍ଯ ଏଵୋ ପରିପୂର୍ଣ ହୁଂ ଛୁଂ. ରାଗ,
ଦ୍ଵେଷ, ମୋହ, କ୍ରୋଧ, ମାନ, ମାଯା, ଲୋଭ, ପାଂଚ ଇନ୍ଦ୍ରିଯୋନା ଵିଷଯଵ୍ଯାପାର, ମନଵଚନକାଯାନା ଵ୍ଯାପାର,
ଭାଵକର୍ମ, ଦ୍ରଵ୍ଯକର୍ମ, ନୋକର୍ମ, ଖ୍ଯାତି, ପୂଜା, ଲାଭ, ଦେଖେଲା, ସାଂଭଳେଲା ଅନେ ଅନୁଭଵେଲା ଭୋଗୋନୀ
ଆକାଂକ୍ଷାରୂପ ନିଦାନ, ମାଯା, ମିଥ୍ଯାତ୍ଵ, ଏ ତ୍ରଣେ ଶଲ୍ଯ ଆଦି ସର୍ଵ ଵିଭାଵପରିଣାମୋଥୀ ରହିତ-ଶୂନ୍ଯ
-ହୁଂ ଛୁଂ. ସର୍ଵ ଜୀଵୋ ପଣ ଆଵା ଜ ଛେ, ଏଵୀ ନିରଂତର ଭାଵନା କରଵୀ. ୪୦୦୦
ହଵେ, ଟୀକାକାର ଅଂତିମ ଶ୍ଲୋକ କହେ ଛେ : —
पांडवरामहिं णरवरहिं पुज्जिउ भक्ति भरेण ।
सिरिसासणु जिणभासियउ णंदउ सुक्खसएहिं ।।१।।
सहज शुद्ध ज्ञानानंद स्वभाव निर्विकल्प हूँ, उदासीन हूँ, निजानंद निरंजन शुद्धात्म सम्यग्दर्शन,
सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्ररूप निश्चयरत्नत्रयमयी निर्विकल्पसमाधिसे उत्पन्न वीतराग
सहजानंदरूप आनंदानुभूतिमात्र जो स्वसंवेदनज्ञान उससे गम्य हूँ, अन्य उपायोंसे गम्य नहीं हूँ ।
निर्विकल्प निजानंद ज्ञानकर ही मेरी प्राप्ति है, पूर्ण हूँ । राग, द्वेष, मोह, क्रोध, मान, माया, लोभ,
पाँचों इन्द्रियोंके विषय व्यापार, मन, वचन काय, द्रव्यकर्म, भावकर्म, नोकर्म, ख्याति पूजा
लाभ, देखे, सुने और अनुभवे भोगोंकी वाँछारूप निदानबंध, माया मिथ्या ये तीन शल्यें इत्यादि
विभाव परिणामोंसे रहित सब प्रपंचोंसे रहित मैं हूँ । तीन लोक, तीन कालमें, मन वचन
कायकर, कृत कारित अनुमोदनाकर, शुद्ध निश्चयसे मैं आत्माराम ऐसा हूँ । तथा सभी जीव
ऐसे हैं । ऐसी सदैव भावना करनी चाहिये । अब टीकाकारके अंतके श्लोकका अर्थ कहते