Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Punjabi transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ਸ਼੍ਰੀ ਦਿਗਂਬਰ ਜੈਨ ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਮਂਦਿਰ ਟ੍ਰਸ੍ਟ, ਸੋਨਗਢ - ੩੬੪੨੫੦
੧੯੪ ]ਯੋਗੀਨ੍ਦੁਦੇਵਵਿਰਚਿਤ: [ ਅਧਿਕਾਰ-੧ : ਦੋਹਾ-੧੨੧
वसतीति क्रियाध्याहारः, तसु तस्य णवि नैवास्ति कोऽसौ बंभु ब्रह्मशब्दवाच्यो
निजपरमात्मा वियारी एवं विचारय त्वं हे प्रभाकरभट्ट अत्रार्थे द्रष्टांतमाह एक्कहिं केम
एकस्मिन् कथं समंति सम्यग्मिमाते सम्यगवकाशं कथं लभेते वढ बत बे खंडा द्वो
खड्गौ असी
क्वाधिकरणभूते पडियारी प्रतिकारे (?) कोशशब्दवाच्ये इति तथाहि
वीतरागनिर्विकल्पपरमसमाधिसंजातानाकुलत्वलक्षणपरमानन्दसुखामृतप्रतिबन्धकैराकुलत्वोत्पादकैः
स्त्रीरूपावलोकनचिन्तादिसमुत्पन्नहावभावविभ्रमविलासविकल्पजालैर्मूर्च्छिते वासिते रञ्जिते परिणते
चित्ते त्वेकस्मिन् प्रतिहारे (?) खड्गद्वयवत्परमब्रह्मशब्दवाच्यनिजशुद्धात्मा कथमवकाशं लभते
न कथमपीति भावार्थः
हावभावविभ्रमविलासलक्षणं कथ्यते ‘‘हावो मुखविकारः
स्याद्भावश्चित्तोत्थ उच्यते विलासो नेत्रजो ज्ञेयो विभ्रमो भ्रूयुगान्तयोः ।।’’ ।।१२१।।
अतीन्द्रिय-सुखरूप अमृत है, उसके रोकनेवाले तथा आकुलताको उत्पन्न करनेवाले जो
स्त्रीरूपके देखनेकी अभिलाषादिसे उत्पन्न हुए हाव (सुख-विकार) भाव अर्थात् चित्तका
विकार, विभ्रम अर्थात् मुँहका टेढ़ा करना, विलास अर्थात् नेत्रोंके कटाक्ष इन स्वरूप
विकल्पजालोंकर, मूर्छित रंजित परिणाम चित्तमें ब्रह्मका (निज शुद्धात्माका) रहना कैसे
हो सकता है ? जैसे कि एक म्यानमें दो तलवारें कैसे आ सकती हैं ? नहीं आ सकतीं
उसी तरह एक चित्तमें ब्रह्म-विद्या और विषय-विनोद ये दोनों नहीं समा सकते जहाँ
ब्रह्म-विचार हे, वहाँ विषय-विकार नहीं है, जहाँ विषय-विकार हैं वहाँ ब्रह्म-विचार नहीं
है
इन दोनोंमें आपसमें विरोध है हाव भाव विभ्रम विलास इन चारोंका लक्षण दूसरी
जगह भी कहा है ‘‘हावो मुखविकारः’’ इत्यादि, उसका अर्थ ऊ पर कर चुके हैं, इससे
दूसरी बार नहीं करा ।।१२१।।
ਏਵਾ ਪਰਮਾਨਂਦਰੂਪ ਜੇ ਸੁਖਾਮ੍ਰੁਤਨੇ ਪ੍ਰਤਿਬਂਧਕ, ਆਕੁਲ਼ਤਾਨਾ ਉਤ੍ਪਾਦਕ ਏਵਾ ਸ੍ਤ੍ਰੀਰੂਪਨੇ ਦੇਖਵਾਨੀ
ਅਭਿਲਾਸ਼ਾਥੀ ਉਤ੍ਪਨ੍ਨ ਹਾਵ, ਭਾਵ, ਵਿਭ੍ਰਮ, ਵਿਲਾਸਨਾ ਵਿਕਲ੍ਪਜਾਲ਼ਥੀ ਮੂਰ੍ਛਿਤ-ਵਾਸਿਤ-ਰਂਜਿਤ
-ਪਰਿਣਤ-ਚਿਤ੍ਤਮਾਂ, ਏਕ ਮ੍ਯਾਨਮਾਂ ਬੇ ਤਲਵਾਰ ਨ ਸਮਾਯ ਤੇਨੀ ਜੇਮ, ‘ਬ੍ਰਹ੍ਮ’ ਸ਼ਬ੍ਦਥੀ ਵਾਚ੍ਯ ਏਵੋ
ਨਿਜਸ਼ੁਦ੍ਧਾਤ੍ਮਾ ਕੇਵੀ ਰੀਤੇ ਅਵਕਾਸ਼ ਮੇਲ਼ਵੇ? ਏ ਭਾਵਾਰ੍ਥ ਛੇ. (ਅਰ੍ਥਾਤ੍ ਨ ਮੇਲ਼ਵੇ.)
ਹਾਵ, ਭਾਵ, ਵਿਭ੍ਰਮ, ਵਿਲਾਸਨੁਂ ਸ੍ਵਰੂਪ ਕਹੇ ਛੇ.
‘‘हावो मुखविकारः स्याद्भावश्चित्तोत्थ उच्यते विलासो नेत्रजो ज्ञेयो विभ्रमो भ्रूयुगान्तयोः ।।’’
(ਅਰ੍ਥ:ਮੁਖਵਿਕਾਰ ਤੇ ਹਾਵ ਛੇ, ਚਿਤ੍ਤਵਿਕਾਰ ਤੇ ਭਾਵ ਛੇ, ਨੇਤ੍ਰਨੋ ਵਿਕਾਰ ਤੇ ਵਿਲਾਸ ਛੇ, ਬਨ੍ਨੇ
ਭਮ੍ਮਰਨਾ ਛੇਡਾਨੋ ਵਿਕਾਰ ਤੇ ਵਿਭ੍ਰਮ ਛੇ.) ੧੨੧.