Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Punjabi transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ਸ਼੍ਰੀ ਦਿਗਂਬਰ ਜੈਨ ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਮਂਦਿਰ ਟ੍ਰਸ੍ਟ, ਸੋਨਗਢ - ੩੬੪੨੫੦
उत्तमु इत्यादि उत्तमु सुक्खु उत्तमं सुखं ण देइ न ददाति जइ यदि चेत् उत्तमु
उत्तमो मुक्खु मोक्षः ण होइ न भवति तो ततः कारणात्, किं किमर्थं, सयलु वि कालु
सकलमपि कालम् जिय हे जीव सिद्ध वि सिद्धा अपि सेवहिं सेवन्ते सोइ तमेव मोक्षमिति
तथाहि यद्यतीन्द्रियपरमाह्लादरूपमविनश्वरं सुखं न ददाति मोक्षस्तर्हि कथमुत्तमो भवति
उत्तमत्वाभावे च केवलज्ञानादिगुणसहिताः सिद्धा भगवन्तः किमर्थं निरन्तरं सेवन्ते च चेत्
तस्मादेव ज्ञायते तत्सुखमुत्तमं ददातीति उक्तं च सिद्धसुखम्‘‘आत्मोपादानसिद्धं स्वयमतिशय-
वद्वीतबाधं विशालं, वृद्धिह्रासव्यपेतं विषयविरहितं निःप्रतिद्वन्द्वभावम् अन्यद्रव्यानपेक्षं निरूपम-
ममितं शाश्वतं सर्वकालमुत्कृष्टानन्तसारं परमसुखमतस्तस्य सिद्धस्य जातम् ।।’’ अत्रेदमेव
भावार्थ :वह मोक्ष अखंड सुख देता है, इसीलिये उसे सिद्ध महाराज सेवते हैं, मोक्ष
परम आह्लादरूप है, अविनश्वर है, मन और इंद्रियोंसे रहित है, इसीलिये उसे सदाकाल सिद्ध
सेवते हैं, केवलज्ञानादि गुण सहित सिद्धभगवान् निरंतर निर्वाणमें ही निवास करते हैं, ऐसा
निश्चित है
सिद्धोंका सुख दूसरी जगह भी ऐसा कहा है ‘‘आत्मोपादान’’ इत्यादि इसका
अभिप्राय यह है कि इस अध्यात्मज्ञानके सिद्धोंके जो परमसुख हुआ है, वह कैसा है कि
अपनी अपनी जो उपादानशक्ति उसीसे उत्पन्न हुआ है, परकी सहायतासे नहीं है, स्वयं (आप
ही) अतिशयरूप है, सब बाधाओंसे रहित है, निराबाध है, विस्तीर्ण है, घटतीबढ़तीसे रहित
है, विषयविकारसे रहित है, भेदभावसे रहित है, निर्द्वन्द्व है, जहाँ पर वस्तुकी अपेक्षा ही नहीं
है, अनुपम है, अनंत है, अपार है, जिसका प्रमाण नहीं सदा काल शाश्वत है, महा उत्कृष्ट
है, अनंत सारता लिये हुए है
ऐसा परमसुख सिद्धोंके है, अन्यके नहीं है यहाँ तात्पर्य यह
ਭਾਵਾਰ੍ਥ:ਜੋ ਮੋਕ੍ਸ਼ ਅਤੀਨ੍ਦ੍ਰਿਯ ਪਰਮ ਆਹ੍ਲਾਦਰੂਪ, ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਸੁਖਨੇ ਨ ਆਪੇ ਤੋ ਤੇ
ਕੇਵੀ ਰੀਤੇ ਉਤ੍ਤਮ ਹੋਯ? ਅਨੇ ਉਤ੍ਤਮਪਣਾਨਾ ਅਭਾਵਮਾਂ ਕੇਵਲ਼ਜ੍ਞਾਨਾਦਿ ਗੁਣਸਹਿਤ ਸਿਦ੍ਧ ਭਗਵਂਤੋ ਸ਼ਾ
ਮਾਟੇ ਮੋਕ੍ਸ਼ਨੇ ਨਿਰਂਤਰ ਸੇਵੇ? (ਪਣ ਸਿਦ੍ਧ ਭਗਵਂਤੋ ਨਿਰਂਤਰ ਮੋਕ੍ਸ਼ਨੇ ਸੇਵੇ ਛੇ) ਤੇਥੀ ਜਣਾਯ ਛੇ ਕੇ
ਤੇ (ਮੋਕ੍ਸ਼) ਉਤ੍ਤਮ ਸੁਖਨੇ ਆਪੇ ਛੇ. ਸਿਦ੍ਧਨਾ ਸੁਖਨੁਂ ਸ੍ਵਰੂਪ (ਸ਼੍ਰੀ ਪੂਜ੍ਯਪਾਦਕ੍ਰੁਤ ਸਿਦ੍ਧਭਕ੍ਤਿ ਗਾਥਾ
੭ਮਾਂ) ਪਣ ਕਹ੍ਯੁਂ ਛੇ ਕੇ :
‘‘आत्मोपादानसिद्धं स्वयमतिशयवद्वीतबाधं विशालं,
वृद्धिह्रासव्यपेतं विषयविरहितं निःप्रतिद्वन्द्वभावम्
अन्यद्रव्यानपेक्षं निरूपमममितं शाश्वतं सर्वकाल-
मुत्कृष्टानन्तसारं परमसुखमतस्तस्य सिद्धस्य जातम्
।।’’
[ਅਰ੍ਥ :ਆਤ੍ਮਾਨਾ ਉਪਾਦਾਨਥੀ ਪ੍ਰਗਟੇਲੁਂ (ਪੋਤਾਨਾ ਆਤ੍ਮਾਮਾਂ ਜ ਉਤ੍ਪਨ੍ਨ ਥਯੇਲ), ਸ੍ਵਯਂ
ਅਧਿਕਾਰ-੨ : ਦੋਹਾ-੭ ]ਪਰਮਾਤ੍ਮਪ੍ਰਕਾਸ਼: [ ੨੧੧