Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Punjabi transliteration). Gatha-14 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ਸ਼੍ਰੀ ਦਿਗਂਬਰ ਜੈਨ ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਮਂਦਿਰ ਟ੍ਰਸ੍ਟ, ਸੋਨਗਢ - ੩੬੪੨੫੦
चारित्रमोहोदयात् पुनर्वीतरागचारित्ररूपं निर्विकल्पशुद्धात्म सत्तावलोकनमपि न संभवतीति
भावार्थः
निश्चयेनाभेदरत्नत्रयपरिणतो निजशुद्धात्मैव मोक्षमार्गो भवतीत्यस्मिन्नर्थे संवाद-
गाथामाह‘‘रयणत्तयं ण वट्टइ अप्पाणं मुइत्तु अण्णदवियम्हि तम्हा तत्तियमइओ होदि हु
मोक्खस्स कारणं आदा ।।’’ ।।१३।।
अथ भेदरत्नत्रयात्मकं व्यवहारमोक्षमार्गं दर्शयति
१४०) जं बोल्लइ ववहारु-णउ दंसणु णाणु चरित्तु
तं परियाणहि जीव तुहुँ जेँ परु होहि पवित्तु ।।१४।।
यद् ब्रूते व्यवहारनयः दर्शनं ज्ञानं चारित्रम्
तत् परिजानीहि जीव त्वं येन परः भवसि पवित्रः ।।१४।।
रुचिरूप सम्यग्दर्शन भी उसके नहीं है, और चारित्रमोहके उदयसे वीतराग चारित्ररूप निर्विकल्प
शुद्धात्माका सत्तावलोकन भी उसके कभी नहीं है
तात्पर्य यह है, निश्चयकर अभेदरत्नत्रयको
परिणत हुआ निज शुद्धात्मा ही मोक्षका मार्ग है ऐसी ही द्रव्यसंग्रहमें साक्षीभूत गाथा कही
है ‘‘रयणत्तयं’’ इत्यादि उसका अर्थ ऐसा है कि रत्नत्रय आत्माको छोड़कर अन्य (दूसरी)
द्रव्योंमें नहीं रहता, इसलिये मोक्षका कारण उन तीनमयी निज आत्मा ही है ।।१३।।
आगे भेदरत्नत्रयस्वरूपव्यवहार वह परम्पराय मोक्षका मार्ग है, ऐसा दिखलाते हैं
गाथा१४
अन्वयार्थ :[जीव ] हे जीव, [व्यवहारनयः ] व्यवहारनय [यत् ] जो [दर्शनं ज्ञानं
ਹੋਵਾਥੀ ‘ਏਕ ਸ਼ੁਦ੍ਧਾਤ੍ਮਾ ਜ ਉਪਾਦੇਯ ਛੇ’ ਏਵੁਂ ਰੁਚਿਰੂਪ ਸਮ੍ਯਗ੍ਦਰ੍ਸ਼ਨ ਜ ਹੋਤੁਂ ਨਥੀ, ਅਨੇ
ਚਾਰਿਤ੍ਰਮੋਹਨਾ ਉਦਯਥੀ ਵੀਤਰਾਗਚਾਰਿਤ੍ਰਰੂਪ ਨਿਰ੍ਵਿਕਲ੍ਪ ਸ਼ੁਦ੍ਧਾਤ੍ਮਸਤ੍ਤਾਵਲੋਕਨ ਪਣ ਤੇਨੇ ਸਂਭਵਤੁਂ ਨਥੀ,
ਏਵੋ ਭਾਵਾਰ੍ਥ ਛੇ.
ਨਿਸ਼੍ਚਯਨਯਥੀ ਅਭੇਦਰਤ੍ਨਤ੍ਰਯ ਪਰਿਣਤ ਨਿਜਸ਼ੁਦ੍ਧਾਤ੍ਮਾ ਜ ਮੋਕ੍ਸ਼ਮਾਰ੍ਗ ਛੇ ਏਵਾ ਅਰ੍ਥਨਾ ਸਂਵਾਦਨੀ
ਗਾਥਾ (ਦ੍ਰਵ੍ਯਸਂਗ੍ਰਹਨੀ ਗਾਥਾ ੪੦) ਕਹੇ ਛੇ ਕੇ‘‘रयणत्तयं ण वट्टइ अप्पाणं भुइत्तु अण्णदवियम्हि तम्हा
तत्तियमइओ होदि हु मोक्खस्स कारणं आदा ।।’’ (ਅਰ੍ਥ :ਆਤ੍ਮਾ ਸਿਵਾਯ ਅਨ੍ਯ ਦ੍ਰਵ੍ਯਮਾਂ ਰਤ੍ਨਤ੍ਰਯ
ਰਹੇਤਾਂ ਨਥੀ ਤੇ ਕਾਰਣੇ ਰਤ੍ਨਤ੍ਰਯਮਯੀ ਆਤ੍ਮਾ ਜ ਖਰੇਖਰ ਮੋਕ੍ਸ਼ਨੁਂ ਕਾਰਣ ਛੇ.) ੧੩.
ਹਵੇ, ਭੇਦਰਤ੍ਨਤ੍ਰਯਾਤ੍ਮਕ ਵ੍ਯਵਹਾਰਮੋਕ੍ਸ਼ਮਾਰ੍ਗਨੇ ਦਰ੍ਸ਼ਾਵੇ ਛੇ :
ਅਧਿਕਾਰ-੨ : ਦੋਹਾ-੧੪ ]ਪਰਮਾਤ੍ਮਪ੍ਰਕਾਸ਼: [ ੨੨੩