Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Punjabi transliteration). Gatha-202 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ਸ਼੍ਰੀ ਦਿਗਂਬਰ ਜੈਨ ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਮਂਦਿਰ ਟ੍ਰਸ੍ਟ, ਸੋਨਗਢ - ੩੬੪੨੫੦
ਅਧਿਕਾਰ-੨ : ਦੋਹਾ-੨੦੧ ]ਪਰਮਾਤ੍ਮਪ੍ਰਕਾਸ਼: [ ੫੩੫
भणितः सिद्ध सिद्धः कथंभूतः महंतु महापुरुषाराधितत्वात् केवलज्ञानादिमहा-
गुणाधारत्वाच्च महान् क एव सो जि स एव स कः योऽसौ मुक्कउ होइ
ज्ञानावरणादिभिः कर्मभिर्मुक्त ो रहितः सम्यक्त्वाद्यष्टगुणसहितश्च जिय हे जीव कथंभूतः
अणंतु न विद्यतेऽन्तो विनाशो यस्य स भवत्यनन्तः किं कृत्वा पूर्वं मुक्त ो भवति
कम्मक्खउ करिवि विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावादात्मद्रव्याद्विलक्षणं यदार्तरौद्रध्यानद्वयं तेनोपार्जितं
यत्कर्म तस्य क्षयः कर्मक्षयस्तं कृत्वा
केन झाणें रागादिविकल्परहितस्वसंवेदनज्ञानलक्षणेन
ध्यानेनेति तात्पर्यम् ।।२०१।।
अथ
३३३) अण्णु वि बंधु वि तिहुयणहँ सासयसुक्खसहाउ
तित्थु जि सयलु वि कालु जिय णिवसइ लद्ध-सहाउ ।।२०२।।
भावार्थ :अरहंतपरमेष्ठी सकल सिद्धान्तोंके प्रकाशक हैं, वे सिद्ध परमात्माको
सिद्धपरमेष्ठी कहते हैं, जिसे सब संत पुरुष आराधते हैं केवलज्ञानादि महान् अनंतगुणोंके
धारण करनेसे वह महान् अर्थात् सबमें बड़े हैं जो सिद्धभगवान् ज्ञानावरणादि आठों ही
कर्मोंसे रहित हैं, और सम्यक्त्वादि आठ गुण सहित हैं ज्ञायकसम्यक्त्व, केवलज्ञान,
केवलदर्शन, अनंतवीर्य, सूक्ष्म, अवगाहन, अगुरुलघु, अव्याबाधइन आठ गुणोंसे मंडित
हैं, और जिसका अन्त नहीं ऐसा निरंजनदेव विशुद्धज्ञान दर्शन स्वभाव जो आत्मद्रव्य उससे
विपरीत जो आर्त रौद्र खोटे ध्यान उनसे उत्पन्न हुए जो शुभ-अशुभ कर्म उनका
स्वसंवेदनज्ञानरूप शुक्लध्यानसे क्षय करके अक्षय पद पा लिया है
कैसा है शुक्लध्यान ?
रागादि समस्त विकल्पोंसे रहित परम निराकुलतारूप है यही ध्यान मोक्षका मूल है, इसीसे
अनन्त सिद्ध हुए और होंगे ।।२०१।।
आगे फि र भी सिद्धोंकी महिमा कहते हैं
ਦਰ੍ਸ਼ਨਸ੍ਵਭਾਵਵਾਲ਼ਾ ਆਤ੍ਮਦ੍ਰਵ੍ਯਥੀ ਵਿਲਕ੍ਸ਼ਣ ਜੇ ਆਰ੍ਤ ਅਨੇ ਰੌਦ੍ਰਰੂਪ ਬੇ ਧ੍ਯਾਨ ਛੇ ਤੇਨਾਥੀ ਉਪਾਰ੍ਜਿਤ
ਜੇ ਕਰ੍ਮ ਛੇ ਤੇਨੋ ਕ੍ਸ਼ਯ ਕਰੀਨੇ ਜੇ ਜ੍ਞਾਨਾਵਰਣਾਦਿ ਕਰ੍ਮਥੀ ਰਹਿਤ ਅਨੇ ਸਮ੍ਯਕ੍ਤ੍ਵਾਦਿ ਆਠ ਗੁਣ ਸਹਿਤ
ਥਾਯ ਛੇ ਅਨੇ ਜੇ ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਛੇ ਤੇਨੇ ਜ ਜਿਨਵਰਦੇਵੇ ਸਿਦ੍ਧ ਕਹ੍ਯਾ ਛੇ
ਕੇ ਜੇ ਸਿਦ੍ਧ ਭਗਵਾਨ
ਮਹਾਪੁਰੁਸ਼ੋਥੀ ਆਰਾਧਿਤ ਹੋਵਾਥੀ ਅਨੇ ਕੇਵਲ਼ਜ੍ਞਾਨਾਦਿ ਮਹਾਗੁਣੋਨਾ ਆਧਾਰ ਹੋਵਾਥੀ ਮਹਾਨ ਛੇ, ਏ
ਤਾਤ੍ਪਰ੍ਯ ਛੇ. ੨੦੧.
ਹਵੇ, ਫਰੀ ਪਣ ਸਿਦ੍ਧੋਨੋ ਮਹਿਮਾ ਕਹੇ ਛੇ :