Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Punjabi transliteration). Gatha-205 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ਸ਼੍ਰੀ ਦਿਗਂਬਰ ਜੈਨ ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਮਂਦਿਰ ਟ੍ਰਸ੍ਟ, ਸੋਨਗਢ - ੩੬੪੨੫੦
ਅਧਿਕਾਰ-੨ : ਦੋਹਾ-੨੦੫ ]ਪਰਮਾਤ੍ਮਪ੍ਰਕਾਸ਼: [ ੫੩੯
भावाहिं भावयन्ति ध्यायन्ति के मुणि मुनयः जे ये केचन किं भावयन्ति सत्थ
शास्त्रम् परमप्प-पयासु परमात्मस्वभावप्रकाशत्वात्परमात्मप्रकाशसंज्ञम् केन भावयन्ति भाविं
समस्तरागाद्यपध्यानरहितशुद्धभावेन किं कृत्वा पूर्वम् जिणेविणु जित्वा कम् मोह
निर्मोहपरमात्मतत्त्वाद्विलक्षणं मोहम् कतिसंख्योपेतम् सयलु समस्तं निरवशेषं जिय हे जीवेति
ते त एवंगुणविशिष्टास्तपोधनाः बुज्झहिं बुध्यन्ति कम् परमत्थु परमार्थशब्दवाच्यं चिदानन्दैक-
स्वभावं परमात्मानमिति भावार्थः ।।२०४।।
अथ
३३६) अण्णु वि भत्तिए जे मुणहिँ इहु परमप्प-पयासु
लोयालोयपयासयरु पावहिँ ते वि पयासु ।।२०५।।
अन्यदपि भक्त्या ये मन्यन्ते इमं परमात्मप्रकाशम्
लोकालोकप्रकाशकरं प्राप्नुवन्ति तेऽपि प्रकाशम् ।।२०५।।
इस परमात्मप्रकाशनामा शास्त्रका [भावयंति ] चिंतवन करते हैं, सदैव इसीका अभ्यास करते
हैं, [जीव ] हे जीव, [ते ] वे [सकलं मोहं ] समस्त मोहको [जित्वा ] जीतकर [परमार्थम्
बुध्यंति ] परमतत्त्वको जानते हैं
।।
भावार्थ :जो कोई सब परिग्रहके त्यागी साधु परमात्मस्वभावके प्रकाशक इस
परमात्मप्रकाशकनामा ग्रंथको समस्त रागादि खोटे ध्यानरहित जो शुद्धभाव उससे निरंतर विचारते
हैं, वे निर्मोह परमात्मतत्त्वसे विपरीत जो मोहनामा कर्म उसकी समस्त प्रकृतियोंको मूलसे
उखाड़ देते हैं, मिथ्यात्व रागादिकोंको जीतकर निर्मोह निराकुल चिदानंद स्वभाव जो परमात्मा
उसको अच्छी तरह जानते हैं
।।२०४।।
आगे फि र भी परमात्मप्रकाशके अभ्यासका फ ल कहते हैं
गाथा२०५
अन्वयार्थ :[अन्यदपि ] और भी कहते हैं, [ये ] जो कोई भव्यजीव [भक्त्या ]
ਭਾਵਾਰ੍ਥ :ਜੇ ਕੋਈ ਮੁਨਿਓ ਨਿਰ੍ਮੋਹ ਪਰਮਾਤ੍ਮਤਤ੍ਤ੍ਵਥੀ ਵਿਲਕ੍ਸ਼ਣ ਮੋਹਨੇ ਜੀਤੀਨੇ ਸਮਸ੍ਤ
ਰਾਗਾਦਿ ਅਪਧ੍ਯਾਨ ਰਹਿਤ ਸ਼ੁਦ੍ਧ ਭਾਵਥੀ ਪਰਮਾਤ੍ਮਸ੍ਵਭਾਵਨੋ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਕ ਹੋਵਾਥੀ ਜੇ ਪਰਮਾਤ੍ਮਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਛੇ
ਏਵਾ ਪਰਮਾਤ੍ਮਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਨਾਮਨਾ ਸ਼ਾਸ੍ਤ੍ਰਨੇ ਧ੍ਯਾਵੇ ਛੇ ਤੇ ਤਪੋਧਨੋ ਪਰਮਾਰ੍ਥਸ਼ਬ੍ਦਥੀ ਵਾਚ੍ਯ, ਚਿਦਾਨਂਦ ਜੇਨੋ
ਏਕ ਸ੍ਵਭਾਵ ਛੇ ਏਵਾ ਪਰਮਾਤ੍ਮਾਨੇ ਜਾਣੇ ਛੇ, ਏ ਭਾਵਾਰ੍ਥ ਛੇ. ੨੦੪.
ਹਵੇ, ਫਰੀ ਪਰਮਾਤ੍ਮਪ੍ਰਕਾਸ਼ਨਾ ਅਭ੍ਯਾਸਨੁਂ ਫਲ਼ ਕਹੇ ਛੇ :