Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२३० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

(आर्या)
यः परिणमति स कर्ता यः परिणामो भवेत्तु तत्कर्म।
या परिणतिः क्रिया सा त्रयमपि भिन्नं न वस्तुतया।। ५१।।

(आर्या)

एकः परिणमति सदा परिणामो जायते सदैकस्य।
एकस्य
परिणतिः स्यादनेकमप्येकमेव यतः।। ५२।।

एवा पुद्गलना परिणामने-के जे पुद्गलथी अभिन्न छे अने पुद्गलथी अभिन्न परिणतिमात्र क्रियाथी करवामां आवे छे तेने-करतो न प्रतिभासो. भावार्थः– आत्मा पोताना ज परिणामने करतो प्रतिभासो; पुद्गलना परिणामने करतो तो कदी न प्रतिभासो. आत्मानी अने पुद्गलनी-बन्नेनी क्रिया एक आत्मा ज करे छे एम माननारा मिथ्याद्रष्टि छे. जड-चेतननी एक क्रिया होय तो सर्व द्रव्यो पलटी जवाथी सर्वनो लोप थई जाय-ए मोटो दोष ऊपजे. हवे आ ज अर्थना समर्थननुं कळशरूप काव्य कहे छेः- श्लोकार्थः– [यः परिणमति स कर्ता] जे परिणमे छे ते कर्ता छे, [यः परिणामः भवेत् तत् कर्म] (परिणमनारनुं) जे परिणाम छे ते कर्म छे [तु] अने [या परिणतिः सा क्रिया] जे परिणति छे ते क्रिया छे; [त्रयम् अपि] ए त्रणेय, [वस्तुतया भिन्नं न] वस्तुपणे भिन्न नथी. भावार्थः– द्रव्यद्रष्टिए परिणाम अने परिणामीनो अभेद छे अने पर्यायद्रष्टिए भेद छे. भेदद्रष्टिथी तो कर्ता, कर्म अने क्रिया त्रण कहेवामां आवे छे पण अहीं अभेदद्रष्टिथी परमार्थ कह्यो छे के कर्ता, कर्म अने क्रिया-त्रणेय एक द्रव्यनी अभिन्न अवस्थाओ छे, प्रदेशभेदरूप जुदी वस्तुओ नथी. प१. फरी पण कहे छे केः- श्लोकार्थः– [एकः परिणमति सदा] वस्तु एक ज सदा परिणमे छे, [एकस्य सदा परिणामः जायते] एकना ज सदा परिणाम थाय छे (अर्थात् एक अवस्थाथी अन्य अवस्था एकनी ज थाय छे) अने [एकस्य परिणतिः स्यात्] एकनी ज परिणति-क्रिया थाय छे; [यतः] कारण के [अनेकम् अपि एकम् एव] अनेकरूप थवा छतां एक ज वस्तु छे, भेद नथी. भावार्थः– एक वस्तुना अनेक पर्यायो थाय छे; तेमने परिणाम पण कहेवाय छे अने अवस्था पण कहेवाय छे. तेओ संज्ञा, संख्या, लक्षण, प्रयोजनादिकथी जुदा जुदा प्रतिभासे छे तोपण एक वस्तु ज छे, जुदा नथी; एवो ज भेदाभेदस्वरूप वस्तुनो स्वभाव छे. प२.