समयसार गाथा ८६ ] [ २३१
उभयोर्न परिणतिः स्वाद्यदनेकमनेकमेव सदा।। ५३।।
नैकस्य च क्रिये द्वे एकमनेकं
र्दुर्वारं ननु मोहिनामिह महाहङ्काररूपं तमः।
तत्किं ज्ञानधनस्य बन्धनमहो भूयो भवेदात्मनः।। ५५।।
वळी कहे छे केः-
श्लोकार्थः– [न उभौ परिणमतः खलु] बे द्रव्यो एक थईने परिणमतां नथी, [उभयोः परिणामः न प्रजायेत] बे द्रव्योनुं एक परिणाम थतुं नथी अने [उभयोः परिणतिः न स्यात्] बे द्रव्योनी एक परिणति-क्रिया थती नथी; [यत्] कारण के [अनेकम् सदा अनेकम् एव] अनेक द्रव्यो छे ते सदा अनेक ज छे, पलटीने एक थई जतां नथी.
भावार्थः– बे वस्तुओ छे ते सर्वथा भिन्न ज छे, प्रदेशभेदवाळी ज छे. बन्ने एक थईने परिणमती नथी, एक परिणामने उपजावती नथी अने तेमनी एक क्रिया होती नथी- एवो नियम छे. जो बे द्रव्यो एक थईने परिणमे तो सर्व द्रव्योनो लोप थई जाय. प३.
फरी आ अर्थने द्रढ करे छेः-
श्लोकार्थः– [एकस्य हि द्वौ कर्तारौ न स्तः] एक द्रव्यना बे कर्ता न होय, [च] वळी [एकस्य द्वे कर्मणी न] एक द्रव्यनां बे कर्म न होय [च] अने [एकस्य द्वे क्रिये न] एक द्रव्यनी बे क्रिया न होय; [यतः] कारण के [एकम् अनेकं न स्यात्] एक द्रव्य अनेक द्रव्यरूप थाय नहि.
भावार्थः– आ प्रमाणे उपरना श्लोकोमां निश्चयनयथी अथवा शुद्धद्रव्यार्थिकनयथी वस्तुस्थितिनो नियम कह्यो. प४.
आत्माने अनादिथी परद्रव्यना कर्ताकर्मपणानुं अज्ञान छे ते जो परमार्थनयना ग्रहणथी एक वार पण विलय पामे तो फरीने न आवे, एम हवे कहे छेः-
श्लोकार्थः– [इह] आ जगतमां [मोहिनाम्] मोही (अज्ञानी) जीवोनो